Thursday, September 19, 2024

कॉर्पोरेट के बोझ तले दम तोड़ती जिंदगियाँ: कब जागेगी सरकार?"


पुणे की युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट, अन्ना सेबास्टियन पेरायिल की कहानी आज हर मेहनतकश भारतीय के दिल में टीस पैदा करती है। अन्ना ने अपने जीवन की बेशकीमती साँसें एक ऐसे सिस्टम के नीचे खो दीं, जहाँ काम को जीवन से ऊपर रखा जाता है। वह EY ग्लोबल की सदस्य फर्म S R Batliboi में काम कर रही थीं, जहाँ 18 घंटे के अनवरत काम के बाद उनके शरीर ने हार मान ली। उनकी माँ ने ‘काम के दबाव’ को उनकी मृत्यु का कारण बताया है, लेकिन क्या सचमुच यह बात हमें चौंकाती है?

आज के भारत में, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियाँ (MNCs) काम करने वालों को ऐसी मशीनों में बदल रही हैं जो बिना रुके, बिना थमे बस काम करती चली जाएं। 18 घंटे के काम को एक सफलता की कहानी के रूप में बेचा जा रहा है। यहाँ, काम का बोझ महिमामंडित किया जा रहा है, और कर्मचारियों से यही उम्मीद की जाती है कि वे इस बोझ को खुशी-खुशी उठा लें।

विडंबना यह है कि यही कंपनियाँ जब भारत से बाहर होती हैं, तो काम के लिए मानवीय नियम-कानूनों का पालन करती हैं। लेकिन भारत? यहाँ कर्मचारियों को "वर्कहॉर्स" की तरह देखा जाता है, जो बिना रुके, बिना शिकायत काम करते रहें। भारत को एक ऐसी फैक्ट्री बना दिया गया है, जो 24 घंटे, सातों दिन, और 365 दिन चालू रहती है, जैसे यहाँ रहने वाले लोग इंसान नहीं, बल्कि काम करने वाली मशीनें हों।

सवाल यह है कि हमारा भारतीय सिस्टम कहाँ है? सरकार, जो हमसे हर साल करोड़ों-करोड़ों टैक्स वसूलती है, हमारी सुरक्षा के लिए क्या कर रही है? जब नौकरी छूटती है, तो सरकार का हाथ हमारे कंधों पर नहीं होता। जब हम काम के दबाव में दम तोड़ते हैं, तो सरकार हमारी पीड़ा सुनने की बजाय हमारी मेहनत से कमाया टैक्स ले जाती है। इस अनदेखी का परिणाम हम जैसे लाखों-करोड़ों लोग भुगत रहे हैं, जो अपना सब कुछ झोंककर भी उस सपने को पूरा नहीं कर पाते जिसे ‘कॉर्पोरेट सफलता’ का नाम दिया जाता है।

यह घटना एक चेतावनी है, एक आखिरी पुकार। अन्ना की मृत्यु ने हमें बताया है कि हमें और देर नहीं करनी चाहिए। सरकार को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाले लोगों के लिए कोई ठोस कानून बने। ऐसी नीतियाँ लागू हों, जो कर्मचारियों को अमानवीय काम के घंटों से बचाएं, और अगर किसी कर्मचारी को नौकरी से निकाला जाए, तो उसे कुछ सुरक्षा मिल सके—चाहे वह वित्तीय हो या मानसिक।

अन्ना की तरह और कितने लोग इस बोझ तले दबेंगे? कब तक हम अपनी जिंदगियों को काम के बोझ में कुर्बान करते रहेंगे? यह वक्त है कि सरकार जागे और हम, मेहनतकश लोग, एक ऐसा सिस्टम मांगें, जहाँ काम के साथ-साथ जीवन को भी अहमियत मिले।

"ओम शांति" उन सभी के लिए जो इस अमानवीय सिस्टम की भेंट चढ़ गए, लेकिन सच्ची शांति तब मिलेगी जब हम सब एकजुट होकर सरकार से बदलाव की मांग करेंगे।

#कॉर्पोरेट_अत्याचार #काम_का_दबाव #सरकार_जागो #जीवन_को_महत्व

No comments: