Thursday, September 12, 2024

मी लॉर्ड, समाज अंधा नहीं है, सब देख रहा है – चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के फैसले पर सवाल


भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की हाल की कुछ टिप्पणियां और फैसले चर्चा का केंद्र बन गए हैं। एक लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का महत्व सबसे ऊपर है, लेकिन जब न्यायपालिका के फैसले कुछ वर्गों में सवाल खड़े कर दें, तो जनता की चिंता स्वाभाविक होती है। समाज अब न्यायपालिका के फैसलों को सिर्फ आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसकी समीक्षा करता है।

SC-ST फैसले पर उठते सवाल:

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने हाल ही में कुछ फैसले सुनाए हैं, जिनमें से SC/ST एक्ट से जुड़े एक फैसले ने खासकर दलित और आदिवासी समुदायों में गहरी नाराजगी पैदा की है। कई लोगों का मानना है कि इस फैसले से उन वर्गों को न्याय मिलने में कठिनाई हो सकती है, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए यह कानून बनाया गया था।

फैसले के बदले में पुरस्कार?

कुछ आलोचक यह तर्क देते हैं कि न्यायपालिका के कुछ बड़े फैसले कहीं न कहीं राजनीतिक रंग भी ले रहे हैं। यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या न्यायपालिका में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपने फैसलों के बदले राज्यसभा की सीट या राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जा रहे हैं?

ऐसे आरोपों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इतिहास में हमने कई जजों को सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक नियुक्तियां पाते देखा है। हालांकि, यह कहना अनुचित होगा कि हर जज के फैसले के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य होता है। लेकिन, जब फैसले विवादित हों और उसके तुरंत बाद उन्हें बड़े पदों पर बैठाया जाए, तो समाज के मन में सवाल उठना लाजमी है।

समाज की नज़र:

आज का समाज पहले की तरह अंधा नहीं है। लोग अब फैसलों को समझते हैं, उनका विश्लेषण करते हैं और अपनी राय बनाते हैं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के SC/ST एक्ट से जुड़े फैसले के बाद कई लोग इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार रख रहे हैं। खासकर दलित और पिछड़े वर्गों के बीच यह डर फैल गया है कि कहीं उनके अधिकारों का हनन न हो जाए।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल नहीं:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है, और इसमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। लेकिन जब न्यायपालिका के फैसले समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करें और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे, तो न्यायपालिका को भी अपने फैसलों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ जैसे न्यायाधीशों से उम्मीद की जाती है कि वे समाज की भावनाओं और उसकी वास्तविकताओं का भी ध्यान रखें, ताकि न्याय सच में समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।

निष्कर्ष:

"मी लॉर्ड, समाज अंधा नहीं है, सब देख रहा है" – इस वाक्य के पीछे समाज की वो भावना छिपी है, जो अब किसी भी फैसले को बिना सवाल किए नहीं मानता। न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह न केवल कानून के अनुसार फैसले दे, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के साथ भी न्याय करे।

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