Sunday, September 1, 2024

यह दोहा संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहों में से एक है,


यह दोहा संत कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहों में से एक है, जिसमें उन्होंने गहन जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है। इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी ने हमें बताया है कि जो अपनी स्वाभाविक स्थिति से अलग हो जाता है, उसका अंत निश्चित है। 

पहली पंक्ति में उन्होंने कहा है कि मछली पानी से बाहर आते ही मर जाती है, परंतु आग कभी भी मछली को मार नहीं सकती। यह दर्शाता है कि मछली का जीवन जल में है, और वह जल से अलग होकर जीवित नहीं रह सकती। इसी प्रकार, संत जो अपने पापों से ग्रस्त होते हैं, वे ईश्वर के गुणगान से दूर हो जाते हैं। 

दूसरी पंक्ति में, कबीरदास जी कहते हैं कि एक नारी अपने पति के बिना नहीं मरती, परंतु परदेश भेजे जाने पर वह चिंता में पड़ जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि जब कोई अपने प्रिय से दूर हो जाता है, तो वह मानसिक और भावनात्मक कष्टों का सामना करता है। यह दूरी और बिछड़न इंसान को भीतर से कमजोर कर देती है।

इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी ने यह सिखाया है कि हमें अपने मूल, अपने स्वाभाविक स्थिति और अपने प्रियजनों से जुड़े रहना चाहिए। जब हम अपने स्वभाव और परिस्थितियों से दूर हो जाते हैं, तो हमारा जीवन संघर्षपूर्ण और कठिन हो जाता है। यही संतों की शिक्षा है कि हमें सच्चे मार्ग पर चलते हुए, ईश्वर और अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहना चाहिए।

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