किसानों की कठिनाई और PACS की बेरुखी
प्रमोद पाण्डे जैसे किसान, जिन्होंने 23 दिसंबर 2024 को PACS केंद्र में अपने धान की बुकिंग करवाई थी, अब तक अपनी उपज को MSP पर बेचने का इंतजार कर रहे हैं। उनके धान के हर पैकेट को बड़े जतन से पैक किया गया है, लेकिन काला PACS केंद्र ने इसे खरीदने में कोई रुचि नहीं दिखाई। किसानों का मानना है कि उनकी समस्या यह है कि वे अपने धान को सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बेचना चाहते हैं।
फर्जीवाड़े की कहानी
दूसरी ओर, काला PACS केंद्र के कागजों पर धान का व्यापार जोरों पर है। रिकॉर्ड में ऐसे किसानों के नाम दर्ज हैं, जिनके खेतों में धान की पराली तक नहीं दिखती। यह फर्जीवाड़ा न केवल असली किसानों को उनके मेहनत का फल देने से रोक रहा है, बल्कि सिस्टम की साख पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
नीचे उन किसानों की जानकारी दी जा रही है, जिन्होंने PACS केंद्र पर अपने धान की बिक्री की है:
1. अंजनी यादव (पिता: गावी यादव) – 45 क्विंटल धान।
2. मुनेश्वर शर्मा (पिता: बंगाली शर्मा) – 95 क्विंटल धान।
3.ब्रह्मदेव प्रसाद यादव (पिता: मालो प्रसाद यादव) – 102 क्विंटल धान।.
4. मनोज कुमार (पिता: श्रीनाथ प्रसाद यादव) – 210 क्विंटल धान।
5. सरिता देवी (पिता: गणेश प्रसाद साह) – 40 क्विंटल धान।
6. बचिया देवी (पिता: बचन पंडित) – 56 क्विंटल धान।
7. शिवलाल साह (पिता: करु साह) – 80 क्विंटल धान।
8. नेहा कुमारी (पिता: बसंत कुमार पंडित) – 60 क्विंटल धान।
9. सुरेंद्र सिंह (पिता: हरि सिंह) – 46 क्विंटल धान।
पुरानी समस्या, वही लड़ाई
यह पहली बार नहीं है जब काला पंचायत के किसानों को इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा है। पिछले साल भी यही स्थिति थी। किसानों ने जिला सहकारिता अधिकारी (DCO) और जिलाधिकारी (DM) के कार्यालयों में शिकायत दर्ज करवाई थी। काफी संघर्ष के बाद PACS केंद्र ने असली किसानों का धान खरीदना शुरू किया था।
किसानों की मांग और लड़ाई
आज फिर किसान अपनी मेहनत की उपज को MSP पर बेचने के लिए PACS केंद्र से पारदर्शिता और ईमानदारी की मांग कर रहे हैं। उनकी यह लड़ाई सिर्फ धान बेचने की नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की है।
क्या कहता है भविष्य?
काला पंचायत के खेतों में खड़े धान के ढेर इंतजार कर रहे हैं कि कब सिस्टम जागेगा और कब किसानों को उनका न्याय मिलेगा। PACS केंद्र को चाहिए कि फर्जी रिकॉर्ड बनाने वालों पर सख्त कार्रवाई करे और असली किसानों की खरीदारी को प्राथमिकता दे।
निष्कर्ष
यह स्थिति बताती है कि किसानों के लिए पारदर्शी और ईमानदार प्रणाली की कितनी आवश्यकता है। काला पंचायत के किसानों की यह लड़ाई न केवल उनकी मेहनत का सम्मान है, बल्कि पूरे कृषि तंत्र की साख बचाने का प्रयास भी है। किसानों की उम्मीद है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और उन्हें उनका हक मिलेगा।
अस्वीकरण
यह ब्लॉग केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है और इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत दृष्टिकोण हैं। इसमें दी गई जानकारी किसानों की समस्याओं और संघर्षों को उजागर करने का प्रयास है। लेखक किसी भी सरकारी या निजी संस्था के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा रहा है। इस ब्लॉग में उल्लिखित जानकारी की सटीकता या पूर्णता की कोई गारंटी नहीं दी जाती है। पाठकों से निवेदन है कि किसी भी निर्णय या कार्रवाई से पहले उपयुक्त पेशेवर से सलाह लें। लेखक इस ब्लॉग के उपयोग से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के कानूनी या वित्तीय नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा।
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