Friday, December 13, 2024

हर साल 1.7 लाख पुरुष आत्महत्या क्यों करते हैं?

पुरुष रोते नहीं” – यह वाक्य बचपन से ही हर लड़के के कानों में गूंजता है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? समाज के बनाए इस सांचे में पुरुषों की भावनाएं दम तोड़ देती हैं। जॉनी डेप और अतुल सुभाष की कहानियां हमें यही सवाल पूछने पर मजबूर करती हैं – क्या पुरुषों की पीड़ा को कोई सुनने वाला है?

जॉनी डेप ने झूठे घरेलू हिंसा के आरोपों का सामना किया। उनकी पूर्व पत्नी एम्बर हर्ड ने उन पर हिंसा और उत्पीड़न के आरोप लगाए, जिससे उनका करियर और इमेज दोनों दांव पर लग गए। अदालत में चले लंबे केस के बाद यह साबित हुआ कि आरोप झूठे थे और एम्बर खुद हिंसा करने वाली थीं। लेकिन इस प्रक्रिया में डेप को 6 साल तक मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और करियर में गिरावट झेलनी पड़ी। यह एक बड़ी जीत थी, लेकिन उनकी जिंदगी से छिनी शांति और सम्मान की भरपाई कौन करेगा?

वहीं, अतुल सुभाष की कहानी इससे कहीं ज्यादा दुखद है। बेंगलुरु के एक होनहार एआई विशेषज्ञ, अतुल ने अपने जीवन में बड़ी सफलता हासिल की थी। लेकिन उनकी पूर्व पत्नी और अदालत ने लगातार उन पर एलिमनी और अन्य कानूनी दबाव डाले। उनके खिलाफ चल रही कार्यवाहियों ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर कर दिया। भारतीय पुरुष आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 1.7 लाख पुरुष आत्महत्या करते हैं, जिनमें से 40% पारिवारिक विवादों का नतीजा होते हैं। अतुल सुभाष इन्हीं आंकड़ों का हिस्सा बन गए। उन्होंने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा, जिसमें उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी और कानूनी प्रणाली को अपने इस कदम के लिए जिम्मेदार ठहराया।

यह तथ्य चिंताजनक है कि धारा 498A (जो महिलाओं को घरेलू हिंसा और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाई गई थी) का 74% तक दुरुपयोग होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल हजारों पुरुष इस धारा के झूठे आरोपों का सामना करते हैं, जिनमें से कई को बरी कर दिया जाता है, लेकिन तब तक उनका जीवन बर्बाद हो चुका होता है।

जॉनी डेप और अतुल सुभाष की कहानियां इस बात का उदाहरण हैं कि पुरुषों को किस तरह सिस्टम और समाज अनदेखा कर देता है। एक ने लड़ाई लड़ी और सच्चाई साबित की, जबकि दूसरा टूट गया। दोनों का दर्द एक जैसा था, लेकिन उनके साथ न्याय का तरीका बिल्कुल अलग।

जब समाज महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा की बात करता है, तो यह जरूरी और सराहनीय है। लेकिन पुरुषों की तकलीफों को नजरअंदाज करना कहां तक सही है? हर चार में से एक पुरुष झूठे घरेलू हिंसा या दहेज के आरोप का सामना करता है। इसके बावजूद, पुरुषों के लिए मानसिक स्वास्थ्य, कानूनी सहारा, या सहानुभूति पर शायद ही कभी चर्चा होती है।

दर्द का कोई लिंग नहीं होता। हमें यह समझना होगा कि न्याय का मतलब सभी के लिए समान होना चाहिए। पुरुष भी इंसान हैं, उनकी तकलीफें भी उतनी ही असली हैं। उन्हें भी सहानुभूति और समझ की जरूरत है। अगर हम ऐसा नहीं कर सकते, तो क्या सच में हमारा समाज "न्यायपूर्ण" कहलाने के लायक है?

अस्वीकरण...
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