सारला वर्मा केस (2009) भारत में सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में मुआवजे की सही गणना के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय था। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा तय करने के लिए एक प्रणाली स्थापित की, जिसे मल्टीप्लायर प्रणाली कहा जाता है। इस प्रणाली में पीड़ित की आय और उम्र के आधार पर मुआवजे की राशि निर्धारित की जाती है। इसके बाद, इस फैसले से कई अन्य मामलों में भी मुआवजे की राशि का निर्धारण किया गया।
एक उदाहरण के रूप में, मंजीत कौर के मामले को देखा जा सकता है। उनके बेटे की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इस केस में अदालत ने पीड़ित की उम्र और भविष्य में होने वाली आय के नुकसान को ध्यान में रखते हुए मुआवजा तय किया। मंजीत कौर के बेटे की उम्र 18 साल थी, तो कोर्ट ने मल्टीप्लायर 18 लागू किया। इस तरह से पीड़ित के परिवार को न्याय मिला।
वसुंधरा देवी के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा तय करने के लिए मल्टीप्लायर प्रणाली का उपयोग किया। यह मामला उत्तर प्रदेश में एक महिला की मृत्यु से जुड़ा था, और अदालत ने पीड़ित की आय और परिवार की निर्भरता को देखते हुए मुआवजे की राशि तय की।
एक और महत्वपूर्ण मामला, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम श्रीमती शीला (2016) था, जिसमें मोटरसाइकिल दुर्घटना में मृतक की पत्नी ने मुआवजे के लिए दावा किया था। इस केस में भी मुआवजा तय करते वक्त पीड़ित की आय का सही आकलन किया गया, और मल्टीप्लायर प्रणाली के अनुसार राशि निर्धारित की गई।
सीमा बनाम दिल्ली परिवहन निगम (2009) मामले में भी यही हुआ, जहां महिला की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। कोर्ट ने मल्टीप्लायर प्रणाली का पालन करते हुए मुआवजा तय किया और कहा कि मुआवजे के लिए पीड़ित की आय और उम्र का सही मूल्यांकन किया जाए।
सारला वर्मा केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि तय करते समय पीड़ित की आय, परिवार की निर्भरता, और मृतक की उम्र को ध्यान में रखना चाहिए। यह सुनिश्चित किया गया कि मुआवजा पीड़ित के परिवार को उनके आर्थिक नुकसान को पूरा करने में मदद करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि मृतक के दाह संस्कार और अंतिम समय के खर्चों को भी मुआवजे में शामिल किया जाए, ताकि परिवार को और अधिक कष्ट का सामना न करना पड़े।
इन फैसलों से यह स्पष्ट हुआ कि जब सड़क दुर्घटनाओं में किसी की मृत्यु होती है, तो पीड़ित के परिवार को न्याय और उचित मुआवजा मिलना चाहिए, जो उनकी आर्थिक स्थिति को स्थिर कर सके।
सारला वर्मा केस (2009) के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना मुआवजे के मामलों में एक स्पष्ट प्रणाली स्थापित की, जिसमें पीड़ित की आय और उम्र के आधार पर मुआवजा तय किया जाता है। इस प्रणाली को मल्टीप्लायर प्रणाली कहा गया। यह प्रणाली पीड़ित की उम्र के अनुसार विभिन्न गुणकों का उपयोग करती है, ताकि मुआवजे की राशि का निर्धारण किया जा सके। यहां एक सरल सूची दी गई है, जो दिखाती है कि विभिन्न उम्र के आधार पर किस प्रकार का मल्टीप्लायर लागू होता है:
1. 15 वर्ष तक: 15
2. 16 से 20 वर्ष: 16
3. 21 से 25 वर्ष: 17
4. 26 से 30 वर्ष: 18
5. 31 से 35 वर्ष: 17
6. 36 से 40 वर्ष: 16
7. 41 से 45 वर्ष: 15
8. 46 से 50 वर्ष: 14
9. 51 से 55 वर्ष: 13
10. 56 से 60 वर्ष: 11
11. 61 से 65 वर्ष: 9
12. 65 वर्ष से ऊपर: 7
इस सूची का उपयोग मुआवजे की राशि का सही निर्धारण करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर पीड़ित की आय ₹350 प्रति दिन है और उनकी उम्र 30 वर्ष है, तो उनके लिए मल्टीप्लायर 18 होगा। इस हिसाब से मुआवजा तय किया जाएगा।
इस प्रणाली के माध्यम से दुर्घटना मुआवजे के मामलों में न्यायपूर्ण और पारदर्शी निर्णय लिया जाता है, ताकि पीड़ित के परिवार को उनके नुकसान का उचित मुआवजा मिल सके।
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