Friday, October 18, 2024

भारत की बीड़ी उद्योग: आर्थिक योगदान और चुनौतियां


बीड़ी उद्योग भारत में एक प्रमुख पारंपरिक उद्योग है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। हाल के शोध से पता चला है कि इस उद्योग का आर्थिक योगदान सीमित है, लेकिन इसमें लाखों लोगों को रोजगार मिलता है, खासकर गरीब और कमजोर वर्गों के बीच। हालाँकि, बीड़ी उद्योग में लगभग 4.2 मिलियन लोग काम करते हैं, इसके आर्थिक उत्पादन का हिस्सा भारत की कुल अर्थव्यवस्था का केवल 0.1% है।

बीड़ी उद्योग का संरचना और कामकाज

बीड़ी उत्पादन एक श्रम-गहन प्रक्रिया है, जिसमें अधिकांश कामकाजी महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। बीड़ी रोलिंग का काम ज्यादातर घरों में किया जाता है, जहाँ श्रमिकों को ठेकेदारों द्वारा कच्चा माल दिया जाता है। इस उद्योग में लगभग 90% उत्पादन असंगठित क्षेत्र के तहत होता है।

बीड़ी श्रमिकों की आय बहुत कम होती है। औसतन, एक बीड़ी श्रमिक 300-500 बीड़ियों के रोलिंग के लिए 25 से 30 रुपए प्रति दिन कमाता है। हालाँकि, सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी के तहत बीड़ी श्रमिकों के लिए आधिकारिक दरें अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बीड़ी श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी लगभग 150 से 200 रुपए प्रति हजार बीड़ी होती है। लेकिन असंगठित क्षेत्र में अधिकांश श्रमिकों को यह न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पाती है।

बीड़ी श्रमिकों को काम के घंटे और उत्पादन लक्ष्य के बावजूद कम वेतन मिलता है, और अक्सर ठेकेदारों द्वारा मजदूरी में कटौती की जाती है, जिससे उनकी स्थिति और कमजोर हो जाती है।

स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव

बीड़ी श्रमिकों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर इस उद्योग का नकारात्मक प्रभाव है। अध्ययन बताते हैं कि बीड़ी निर्माण में काम करने वाले लोगों को पोस्टरल समस्याएं, सांस की बीमारियां और त्वचा रोग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, बीड़ी उद्योग में काम करने वाले लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं।

आर्थिक चुनौतियां और समाधान

बीड़ी उद्योग से जुड़े श्रमिकों को आर्थिक लाभ सीमित है। औसतन, प्रत्येक बीड़ी श्रमिक का वार्षिक आर्थिक उत्पादन केवल 143 अमेरिकी डॉलर है। उद्योग के खिलाफ एक प्रमुख तर्क यह है कि इस पर कर बढ़ाने से गरीबों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और उद्योग में काम करने वाले लाखों लोगों की जीविका पर असर पड़ेगा। लेकिन शोध यह दिखाता है कि उच्च करों से आर्थिक गतिविधियों में बड़ी गिरावट की संभावना नहीं है।

शोध से यह भी पता चलता है कि बीड़ी उद्योग पर कर बढ़ाने से न केवल राजस्व बढ़ेगा, बल्कि धूम्रपान में कमी आएगी और स्वास्थ्य में सुधार होगा। भारत में हर साल बीड़ी धूम्रपान से लगभग 1 मिलियन लोग मरते हैं। ऐसे में, इस उद्योग के संकुचन से दीर्घकालिक आर्थिक विकास पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

निष्कर्ष

बीड़ी उद्योग का आर्थिक योगदान अपेक्षाकृत कम है, जबकि इसका स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव बड़ा है। इसे ध्यान में रखते हुए, नीतिगत सुधार और कर संरचना में बदलाव से न केवल सरकार को आर्थिक लाभ मिलेगा, बल्कि इससे धूम्रपान पर नियंत्रण भी हो सकेगा, जिससे जनसंख्या के स्वास्थ्य में सुधार होगा।

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