Thursday, October 31, 2024
पहली कलाकारी: मेरी तीन साल की बेटी द्वारा सजाया गया दीपक
Wednesday, October 30, 2024
बिहार लोक शिकायत निवारण प्रणाली: जमुई में असफलता
काला पंचायत में मनरेगा के माध्यम से तेज़ी से विकास कार्यों की शुरुआत – जल स्रोतों के पुनर्भरण और नई परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ी
मनरेगा योजना से निर्मित जीविका भवन, प्रखंड लक्ष्मीपुर (जमुई)
Monday, October 28, 2024
लक्ष्मीपुर तालुका की मेडिकल सेवाएं: सुप्रीम कोर्ट के आदेश और ड्रग्स एक्ट के नियमों का पालन अनिवार्य
लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई जिले बिहार में केवल 17 कैमिस्ट शॉप्स हैं, जो स्थानीय समुदाय की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। काला पंचायत में तीन प्रमुख अधिकृत मेडिकल शॉप्स हैं:
- मनोज मेडिकल हॉल (JM-34/2016)
- दीपक मेडिकल हॉल (JM-25/2014)
- जनता मेडिकल हॉल (JM-14/2014)
यह जानकारी STATE DRUGS CONTROL ADMINISTRATION, BIHAR से प्राप्त की गई है। ये सभी कैमिस्ट शॉप्स लाइसेंस प्राप्त हैं और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रावधानों के तहत दवाओं का वितरण करती हैं। इन नियमों के तहत कैमिस्ट शॉप्स को दवाइयों की सुरक्षा, भंडारण, और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपाय करने की आवश्यकता होती है, ताकि लोगों को मानक के अनुरूप दवाएँ मिल सकें।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और महत्वपूर्ण प्रश्न:
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यह स्पष्ट किया है कि स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर व्यवसाय का दायित्व है कि वह दवाइयों और स्वास्थ्य उपकरणों का वितरण पूरी पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ करे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, सभी कैमिस्ट शॉप्स को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और IPC के मानकों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है। इसमें निम्नलिखित प्रमुख बिंदु शामिल हैं:
- दवाइयों का उचित भंडारण: क्या इन शॉप्स में भंडारण मानकों का पालन हो रहा है, जैसे तापमान नियंत्रण और सुरक्षा उपाय?
- दवाइयों की वैधता और गुणवत्ता: क्या ग्राहकों को दी जाने वाली सभी दवाइयाँ प्रमाणित और वैध हैं?
- कानूनी दिशानिर्देशों का पालन: क्या ये शॉप्स सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार हर दवा की बिक्री में ट्रांसपेरेंसी रख रही हैं और क्या उपभोक्ताओं को बिल प्रदान किया जा रहा है?
Sunday, October 27, 2024
कैनूहट-काला पत्थर रोड पर बालू भंडारण की समस्या और दुर्घटनाओं का खतरा
Saturday, October 26, 2024
जीनहरा प्राइवेट क्लिनिक की बदहाल तस्वीर: स्वास्थ्य या बीमारी का घर?
बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में धर्मांतरण का बढ़ता संकट: काला पंचायत में जागरूकता की जरूरत
Friday, October 25, 2024
काला पंचायत में पंचायत कार्यालय निर्माण कार्य का शुभारंभ
Thursday, October 24, 2024
धान की खरीद नवंबर से होगी शुरू - किसानों के लिए बड़ी खबर!
न्यूरोलॉजी में DuoMAG XT rTMS: AMT और RMT की सरल जानकारी
Monday, October 21, 2024
ब्लॉग शीर्षक: "लक्ष्मीपुर, जमुई: स्कूल वैन की अनदेखी और बच्चों की सुरक्षा"
"अनुशासन ही सच्ची स्वतंत्रता का आधार है।" — डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
हम सभी अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कठिन परिश्रम करते हैं। उन्हें स्कूल भेजना, उन्हें शिक्षा देना, और अनुशासन सिखाना हमारे कर्तव्यों में शामिल है। लेकिन क्या हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे बच्चों की यात्रा सुरक्षित है?
लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई जिले में एक गंभीर स्थिति सामने आई है। स्कूल वैन (गाड़ी संख्या: BR46B6257) की बीमा समाप्त हो चुकी है और इसकी फिटनेस भी एक्सपायर हो चुकी है। यह हमारे बच्चों के लिए एक गंभीर खतरा है। हमारे स्कूल का मुख्य उद्देश्य बच्चों में अनुशासन विकसित करना और उन्हें एक उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाना है।
यह केवल इस वैन का मुद्दा नहीं है; जमुई जिले में कई स्कूल वैन ऐसे हैं जो बिना उचित दस्तावेजों के चल रहे हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि यह न केवल बच्चों की सुरक्षा को खतरे में डालता है, बल्कि यह स्कूलों की जिम्मेदारी और प्रशासनिक कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाता है।
मैं इस ब्लॉग में वैन के दस्तावेज़ों की जानकारी का स्क्रीनशॉट संलग्न कर रहा हूँ, ताकि सभी को इस गंभीर समस्या का पता चल सके।
मैं जिला परिवहन अधिकारी, जमुई से निवेदन करता हूँ कि कृपया इस मामले को गंभीरता से लें। यह स्थिति आपके कार्य की गुणवत्ता का प्रतिबिंब है और इसने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या यह उचित है कि ऐसे वाहन बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं? क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि हम बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें?
स्कूल प्रशासन से अनुरोध है कि वे अपने वाहन के बीमा और फिटनेस प्रमाणपत्र का तुरंत नवीनीकरण करवाएँ। यह केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हमारे बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारी है।
हम सभी को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। आइए, हम एकजुट होकर अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाएं।
अस्वीकृति:
इस ब्लॉग में दी गई जानकारी केवल जागरूकता बढ़ाने और समाज के सामने महत्वपूर्ण मुद्दों को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से है। यह लेखक की व्यक्तिगत राय है और इसमें व्यक्त विचारों का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था या संगठन को लक्षित करना नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस मुद्दे के संबंध में संबंधित प्राधिकरणों से उचित जानकारी प्राप्त करें और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएँ
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Saturday, October 19, 2024
माटिया गांव, लक्ष्मीपुर, जमुई, बिहार में प्रकृति ग्राम: एक आत्मनिर्भरता की दिशा में पहल
माटिया गांव, लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई, बिहार में स्थित "प्रकृति ग्राम" एक अनूठी पहल के तहत गांव को आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से सशक्त बनाने का काम कर रहा है। यहां विभिन्न योजनाओं के माध्यम से ग्रामीणों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिल रहे हैं, जिससे गांव की आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
मसाला उद्योग: ग्रामीणों की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
प्रकृति ग्राम में कुटीर उद्योगों के माध्यम से "मसाला उद्योग" की स्थापना की गई है, जो ग्रामीणों, विशेषकर "नेचर दीदी" और "नेचर भैया" को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही यह गांवों को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। यहां हल्दी, जीरा, काली मिर्च, धनिया और लाल मिर्च पाउडर का 100% शुद्ध और सस्ता उत्पादन किया जा रहा है। इन मसालों का उपयोग न केवल आर्थिक बचत करेगा, बल्कि यह स्वास्थ्य में सुधार के लिए भी प्रभावी साबित हो रहा है।
नर्सरी: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान
प्रकृति ग्राम ने पौधों की एक नर्सरी भी स्थापित की है, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस नर्सरी के माध्यम से पर्यावरण हितैषी पौधों को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, यहां लकड़ी देने वाले और औषधीय पौधों के रोपण पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण का संरक्षण हो, बल्कि लोगों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सके।
कार्बो फार्मर: सिंदुवार पत्तियों से आर्थिक लाभ
प्रकृति ग्राम के "कार्बो फार्मर" कार्यक्रम के तहत किसान और मजदूर "सिंदुवार" पौधे की पत्तियों को तोड़कर कंपनियों को बेचकर आर्थिक लाभ कमा रहे हैं। इसके साथ ही, यहां बागवानी और खेती में विविधता लाने पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे किसानों की आमदनी में इज़ाफ़ा हो रहा है।
प्रमुख योगदानकर्ता:
अर्जुन मंडल जी: राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अर्जुन मंडल जी कृषि, बागवानी और नर्सरी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति की सुरक्षा के लिए काम कर रहे हैं। उनकी ये पहल ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ खेती और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा योगदान दे रही है।
मुक्ति रानी जी: सामाजिक क्षेत्र में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मुक्ति रानी जी सामाजिक पहलों के माध्यम से एक सशक्त समाज के निर्माण की दिशा में प्रयासरत हैं। उनका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना और उन्हें मुख्यधारा में लाना है।
नंदलाल जी: नदी संरक्षण में विशेषज्ञता रखने वाले नंदलाल जी प्रकृति ग्राम के माध्यम से जल और नदी संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उनके प्रयास से जलीय पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है और स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है।
प्रकृति ग्राम के इन प्रयासों ने न केवल पर्यावरण और कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाए हैं, बल्कि ग्रामीणों को आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। माटिया गांव में इस तरह की पहलें बिहार के अन्य गांवों के लिए एक प्रेरणास्रोत साबित हो सकती हैं।
Friday, October 18, 2024
भारत की बीड़ी उद्योग: आर्थिक योगदान और चुनौतियां
Monday, October 14, 2024
ब्राह्मण का धन भूलकर भी न खाए"।
महाभारत, जो कि भारतीय धर्म, संस्कृति, और जीवन का एक अद्वितीय महाकाव्य है, हमें श्रीकृष्ण के द्वारा दिए गए अनेक मूल्यवान उपदेशों का साक्षी बनाता है। महाभारत के विभिन्न अध्यायों में श्रीकृष्ण ने धर्म, सत्य, न्याय और मानव मूल्यों को लेकर कई गूढ़ शिक्षाएं दी हैं। इसी क्रम में, उन्होंने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया था कि "ब्राह्मण का धन भूलकर भी न खाए।" यह उपदेश महाभारत के अनुशासन पर्व, अध्याय 92 में आता है, जहाँ भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के बीच संवाद हो रहा है और धर्म की गहरी व्याख्या की जा रही है।
समय और संदर्भ:
यह उपदेश महाभारत के युद्ध के बाद का है, जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध समाप्त हो चुका था। युधिष्ठिर, जो युद्ध के बाद भारी दुख और आत्मग्लानि में थे, भीष्म पितामह से जीवन, धर्म और राजधर्म के बारे में ज्ञान प्राप्त कर रहे थे। यह संवाद उस समय का है जब भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर लेटे हुए थे, और श्रीकृष्ण स्वयं भी वहाँ उपस्थित थे। श्रीकृष्ण के माध्यम से यह शिक्षा तब दी गई थी, जब युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राजा के रूप में अपने कर्तव्यों और नैतिकताओं का बोध कराया जा रहा था। समय काल की दृष्टि से, यह घटना महाभारत युद्ध के अठारहवें दिन के बाद और भीष्म पितामह की मृत्यु से पूर्व घटित होती है, जो कि शीत ऋतु के प्रारंभिक समय में बताई जाती है।
अध्याय 92, अनुशासन पर्व:
इस अध्याय में, भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म और व्यक्तिगत धर्म के विभिन्न आयामों के बारे में विस्तार से समझाया। श्रीकृष्ण, जो इस संवाद में एक मार्गदर्शक के रूप में उपस्थित थे, ने युधिष्ठिर को यह महत्वपूर्ण चेतावनी दी कि राजा या कोई भी व्यक्ति ब्राह्मण का धन भूलकर भी न हड़पे। यहाँ "धन" का तात्पर्य केवल भौतिक संपत्ति से नहीं है, बल्कि ब्राह्मण की तपस्या, ज्ञान, और उसके द्वारा अर्जित पुण्य से भी है।
इस उपदेश का अर्थ:
ब्राह्मण को भारतीय समाज में ज्ञान, तपस्या और धर्म के संवाहक के रूप में माना जाता है। वह अपने तप और विद्या के माध्यम से समाज को दिशा देता है और इसका प्रतिफल उसे समाज द्वारा आदर और सम्मान के रूप में मिलता है। श्रीकृष्ण का यह उपदेश ब्राह्मण के धन को हड़पने से मना करता है, क्योंकि यह केवल धन की चोरी नहीं है, बल्कि धर्म और सत्य की अवमानना है।
श्रीकृष्ण इस संदेश के माध्यम से यह भी बताते हैं कि ब्राह्मण का धन किसी भी प्रकार से हड़पने से जीवन में अपयश और अधर्म की वृद्धि होती है। इसके परिणामस्वरूप, व्यक्ति न केवल अपने कर्मों का दोषी बनता है, बल्कि उसे अपने अगले जन्मों में भी इस अधर्म का फल भुगतना पड़ता है।
नैतिक और सामाजिक संदेश:
इस उपदेश का गहरा नैतिक संदेश यह है कि हम किसी भी व्यक्ति के धर्म, तप और उसकी मेहनत से अर्जित संपत्ति का अनादर न करें। ब्राह्मण का धन यहाँ प्रतीकात्मक रूप से किसी भी व्यक्ति के परिश्रम और ईमानदारी से अर्जित संपत्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। श्रीकृष्ण इस बात पर बल देते हैं कि अन्यायपूर्ण तरीकों से अर्जित धन न केवल समाज में विघटन लाता है, बल्कि आत्मा को भी दूषित करता है।
महाभारत की यह शिक्षा हमें यह सिखाती है कि धर्म, न्याय और सत्य का पालन करना हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। ब्राह्मण का धन, जो उसके तप और सेवा का फल होता है, उसे हड़पने का प्रयास अधर्म की श्रेणी में आता है।
महाभारत की यह शिक्षा हमें यह सिखाती है कि धर्म, न्याय और सत्य का पालन करना हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। ब्राह्मण का धन, जो उसके तप और सेवा का फल होता है, उसे हड़पने का प्रयास अधर्म की श्रेणी में आता है।
इस प्रकार, महाभारत के अनुशासन पर्व में श्रीकृष्ण का यह उपदेश न केवल उस समय के समाज के लिए प्रासंगिक था, बल्कि आज भी यह हमें सिखाता है कि किसी भी व्यक्ति की संपत्ति या परिश्रम का अनादर नहीं करना चाहिए। जब हम इस प्रकार के कर्तव्यों का पालन करते हैं, तब ही हम सच्चे अर्थों में धर्म के मार्ग पर चल सकते हैं।