काला लक्ष्मीपुर: बिहार के लोक पर्वों में छठ पूजा का अलग ही महत्व है। लेकिन, आज यह पर्व एक प्रतीक बन गया है उस दर्द का, जो हमने अपने गाँव के तालाबों को अनदेखा कर, दूसरों के सहारे छोड़ दिया है। "काला आहार," जो हमारे पूर्वजों के समय से हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रहा है, आज एक गंदे, उपेक्षित जलाशय में बदल चुका है। हमारे गाँव से महज 100 मीटर की दूरी पर यह तालाब है, फिर भी हम तीन किलोमीटर दूर गैरबा नदी जाकर पूजा करने को मजबूर हैं। क्या हमने अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का संघर्ष छोड़ दिया है?
कभी यह तालाब गाँव की शान था। हमारे बुजुर्गों के अनुसार, यहाँ आकर छठ पर्व मनाना अपने आप में गर्व की बात होती थी। "काला आहार" केवल एक जलाशय नहीं है; यह हमारे पूर्वजों की कड़ी मेहनत और सामाजिक एकता का प्रतीक है। लेकिन आज, यह किसी अतिक्रमण का शिकार बन गया है। कुछ लोग अपनी निजी सुविधा के लिए गंदे पानी और कचरे को यहीं डालते हैं, जिससे यह तालाब और भी दूषित हो गया है। क्या यह हमारे पुश्तैनी तालाब की सही दशा है?
"काला आहार" को पुनर्जीवित करना सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक चुनौती भी है, जो हमें अपने पूर्वजों के प्रति, हमारी संस्कृति के प्रति निभानी चाहिए। इसके लिए पहल करनी होगी। हम अपने गाँव की आधी आबादी को तीन किलोमीटर पैदल चलने से बचा सकते हैं, अगर हम अपनी धरोहर को संजीवनी दे पाएं। इस सफाई अभियान में सभी गाँववाले शामिल हो सकते हैं, पंचायत के स्तर पर ठोस योजना बनाई जा सकती है, और युवाओं की टोली यह जिम्मेदारी संभाल सकती है। अगर गैरबा नदी की सफाई जेसीबी से हो सकती है, तो काला आहार की क्यों नहीं?
कल्पना कीजिए, अगर काला आहार को पुनर्जीवित किया जाए, तो यह गाँव के हर व्यक्ति के लिए गर्व का विषय बनेगा। बच्चों को यहाँ खेलने का स्थान मिलेगा, छठ पर्व के आयोजन का एक स्थायी स्थल मिलेगा, और महिलाओं को निर्जला व्रत के साथ दूर नदी तक जाने की ज़रूरत नहीं होगी। हम इस धरोहर को खोने का दर्द झेल रहे हैं, लेकिन अगर हम आज संकल्प लें, तो यही काला आहार कल का पवित्र स्थल बन सकता है, जहाँ हमारे बच्चे भी आस्था और सम्मान के साथ पूजा कर सकेंगे।
काला आहार की सफाई और पुनरुत्थान के लिए हमें केवल सफाई नहीं करनी है, बल्कि इस तालाब के संरक्षण और देखभाल का भी संकल्प लेना है। पंचायत, आंगनवाड़ी केंद्र, मंदिरों और गाँव के हर व्यक्ति को एकजुट होकर इसे फिर से संजीवनी देने में योगदान देना चाहिए। सिर्फ एक दिन की सफाई से काम नहीं चलेगा, इसके लिए निरंतर ध्यान देना होगा, इसे एक अभियान बनाना होगा।
हम इस पुकार को नजरअंदाज नहीं कर सकते, क्योंकि यह पुकार सिर्फ एक तालाब की नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों की है। आइए, एकजुट होकर इस चुनौती को स्वीकारें, काला आहार को फिर से जीवन दें और आने वाली पीढ़ियों को इसे एक उपहार के रूप में सौंपें।
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