सरकारी प्रयासों के बावजूद हमारी अनदेखी: बिहार सरकार ने लगभग 85 लाख रुपये की लागत से इस तालाब का निर्माण लघु जल संसाधन विभाग, जमुई के अंतर्गत करवाया था। उद्देश्य था जल संरक्षण, ग्रामीण सुविधा और सांस्कृतिक पर्वों को बढ़ावा देना। "जल जीवन हरियाली" जैसी योजनाओं के माध्यम से सरकार हरियाली और जल स्रोतों के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतनी बड़ी योजना के बावजूद हम, स्थानीय लोग, इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं मान रहे हैं।
काला आहार - केवल एक तालाब नहीं, हमारी पहचान: काला लक्ष्मीपुर के इस ऐतिहासिक तालाब का नाम है "काला आहार," जो हमारे पूर्वजों की धरोहर और उनकी कठिन मेहनत का प्रतीक है। यह तालाब कभी हमारे लोक पर्व, विशेषकर छठ पूजा का गौरव हुआ करता था। बुजुर्गों का कहना है कि यहां छठ मनाने का अनुभव, गांव के गौरव का अहसास कराता था। लेकिन आज इसकी हालत ऐसी हो गई है कि गांव से महज 100 मीटर की दूरी पर स्थित होते हुए भी हमें तीन किलोमीटर दूर गैरबा नदी जाकर पूजा करनी पड़ती है।
धरोहर की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन? जो तालाब कभी हमारे गांव की शान हुआ करता था, वह आज उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार बन गया है। कचरा, गंदगी और लापरवाही ने इसे बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया है। यह तालाब अब उन अनगिनत कचरों का ठिकाना बन चुका है जिन्हें आसपास के लोग अपनी सुविधा के लिए यहां डाल देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है - क्या यह वही काला आहार है, जिसे हमारे पूर्वजों ने संजोया था? क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि अपनी ही धरोहर की दुर्दशा पर खामोश हैं?
संकल्प का समय: काला आहार को पुनर्जीवित करना हमारे लिए महज एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। अगर आज हम इस तालाब की देखभाल में योगदान दे सकते हैं, तो न केवल हम अपनी धरोहर को बचा पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी इसे एक अद्वितीय सांस्कृतिक उपहार के रूप में छोड़ पाएंगे।
कल्पना कीजिए, अगर हम सब मिलकर इस तालाब को संजीवनी दें, तो यह हमारे गांव का गौरव बनेगा। छठ पर्व का आयोजन यहीं होगा, महिलाओं को निर्जला व्रत में तीन किलोमीटर दूर जाने की जरूरत नहीं होगी, और बच्चों को खेलने के लिए एक सुरक्षित स्थान मिलेगा। आइए, इस अभियान का हिस्सा बनें। यह केवल एक सफाई का काम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और पारिवारिक पहचान को पुनर्जीवित करने का आंदोलन है।
काला आहार की पुकार हमसे है: यह केवल एक तालाब की पुकार नहीं है, यह हमारे भीतर छुपी उस जड़ों की पुकार है जो हमें अपनी माटी से जोड़े रखती है। आइए, अपने गांव को, अपनी संस्कृति को और अपने पूर्वजों की धरोहर को संजीवनी देने का संकल्प लें। काला आहार हमारा था, है और रहेगा – बस हमें उसे फिर से जीवंत करने की ज़रूरत है।
अस्वीकरण:
कृपया ध्यान दें कि ब्लॉग में दिए गए विचार और दृष्टिकोण लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं और इसका मकसद केवल विषय पर जागरूकता फैलाना है। यदि किसी भी प्रकार की जानकारी से कोई असुविधा होती है, तो इसके लिए ब्लॉग लेखक की ओर से क्षमा प्रार्थी है।
आपकी समझ और सहयोग के लिए धन्यवाद।
No comments:
Post a Comment