प्रधानमंत्री का आगमन और गुमशुदा टोपी की खोज
कल, 15 नवंबर को, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के जमुई का दौरा करेंगे, जहाँ वह जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे। यह आयोजन जनजातीय नायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती समारोह का प्रारंभ है। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी करेंगे, जिनकी कुल लागत 6,640 करोड़ रुपये से अधिक है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य जनजातीय समुदायों का उत्थान और ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे में सुधार करना है।
हर बार की तरह, इस बार भी प्रधानमंत्री का एक स्लोगन चर्चा में है - "एक हैं तो सेफ़ हैं।" यह स्लोगन कुछ समय पहले महाराष्ट्र के स्थानीय अखबारों में भी प्रकाशित हुआ था, जहाँ इसने काफी सुर्खियाँ बटोरी थीं। इस स्लोगन में कई टोपियाँ और धार्मिक प्रतीक दिखाए गए हैं, जो विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन ध्यान से देखने पर, एक खास टोपी गायब नज़र आती है। प्रिय पाठकों, क्या आप इस स्लोगन में से उस गुमशुदा टोपी को ढूँढ सकते हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पिछले 10 सालों में केंद्र में कई योजनाएँ लागू की हैं और विकास के कई वादे किए हैं। लेकिन चुनाव का मौसम आते ही, अक्सर इन वर्षों के विकास कार्य पीछे छूट जाते हैं और धार्मिक मुद्दे व प्रतीक आगे आ जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि पुराने कामों का हिसाब देने की बजाय, धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को जनता के सामने रखा जाता है ताकि वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाया जा सके।
सरकार के 10 साल के कार्यकाल में कई उपलब्धियाँ रही हैं, परंतु चुनावी मंच पर जब सरकार को अपने काम का हिसाब देना चाहिए, तब यह मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं। इनकी जगह धार्मिक प्रतीकों, मुद्दों और संकेतों का सहारा लिया जाता है। विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का उपयोग कर लोगों की भावनाओं को भड़काया जाता है, और जनता में सांप्रदायिक भूख को बढ़ावा देने का प्रयास होता है। यह एक राजनीतिक चाल हो सकती है जो ध्यान भटकाने के लिए की जाती है, जिससे वास्तविक मुद्दों पर सवाल न उठाए जाएँ।
प्रधानमंत्री की इस यात्रा से कई उम्मीदें हैं, और लोग यह जानना चाहते हैं कि वह इस बार किस प्रकार का संदेश देंगे। क्या वह विकास के मुद्दों पर बात करेंगे, या फिर धार्मिक प्रतीकों के सहारे जनता का समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे?
हमारे देश में धर्म और संस्कृति का बहुत महत्त्व है, और यही कारण है कि हर चुनाव में इनका जिक्र किया जाता है। परंतु, जनता भी अब जागरूक हो चुकी है और समझती है कि उनके असली मुद्दे क्या हैं। हर चुनावी सभा में विकास की बात होनी चाहिए - स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाएँ, जिनका लाभ हर भारतीय नागरिक को मिलना चाहिए।
प्रिय पाठकों, प्रधानमंत्री की इस यात्रा पर आपके क्या विचार हैं? क्या आप मानते हैं कि अब समय आ गया है कि धार्मिक प्रतीकों से ऊपर उठकर विकास के असल मुद्दों पर ध्यान दिया जाए?
अस्वीकरण:
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत दृष्टिकोण हैं। यह लेख केवल सूचना और विचार विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है और इसमें किसी भी प्रकार का राजनीतिक या धार्मिक पक्षधरता व्यक्त नहीं की गई है। लेख में उल्लिखित घटनाएँ और विषय वर्तमान परिस्थितियों पर आधारित हैं और इसका उद्देश्य समाज में जागरूकता और विचारों का आदान-प्रदान करना है। लेखक किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति का पक्ष नहीं लेता और पाठकों से अपील करता है कि वे इस लेख को स्वतंत्र रूप से विचार करके पढ़ें।
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