आज का दिन मेरे लिए निराशा का रहा, जब मैंने स्वास्थ्य और वेलनेस सेंटर, स्वास्थ्य उपकेन्द्र रतनपुर, प्रखंड-गिद्धौर, जमुई का दौरा (यात्रा ) किया। उम्मीद थी कि यहां के मरीजों को उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही होंगी, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी।
जब मैं वहां पहुंचा, तो मुझे पता चला कि डॉक्टर उपस्थित नहीं थे। इस स्थिति को देखकर मैं हैरान रह गया, क्योंकि स्वास्थ्य सेवाएं तो लोगों की जान से जुड़ी होती हैं। फिर मैंने बीसीएम गिद्धौर अस्पताल को कॉल किया, और अस्पताल के अधिकारी ने कहा कि अस्पताल खुला है, लेकिन जब मैं वहां पहुंचा, तो मुझे कोई भी स्टाफ नहीं मिला। यह स्थिति वाकई चिंताजनक है।
स्वास्थ्य उपकेन्द्र का निर्धारित समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक था, लेकिन डॉक्टर और स्टाफ़ का न होना सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। जब सरकारी अस्पतालों में ऐसे हालात होंगे, तो गरीब और साधारण लोग कहां जाएंगे?
इससे सबसे ज्यादा फायदा निजी क्लीनिकों को हो रहा है, जहां मरीजों को मनमाने दामों पर इलाज दिया जा रहा है। ये निजी क्लीनिकों वाले हमारे गांव के मासूम लोगों को पैनिक करते हैं, जिससे उन्हें बहुत नुकसान हो रहा है।
मैं संबंधित विभागों से आग्रह करता हूं कि इस लापरवाही के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त और जिम्मेदार बनाना हमारे समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। गांवों के लोग सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों का सहारा लेते हैं, लेकिन जब वहां का माहौल ही ठीक न हो, तो उनका भरोसा किस पर होगा?
हम सब को मिलकर इस मुद्दे पर आवाज़ उठानी चाहिए और सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।
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Correction
मैंने इस ब्लॉग को सही किया है। मैं स्वास्थ्य उपचार के लिए एक मरीज के रूप में वहां गया था। मेरी यात्रा का उद्देश्य उपचार प्राप्त करना था, और मैं वहां स्वास्थ्य सुविधाओं का निरीक्षण करने के लिए नहीं, बल्कि इलाज के लिए गया था। यह महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग सही तरीके से किया जाए, और इसे ध्यान में रखते हुए मैंने अपनी व्यक्तिगत अनुभव को साझा किया।
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