Thursday, November 21, 2024

12 वर्षों तक भूमि के उपयोग से कैसे प्राप्त करें स्वामित्व अधिकार बिहार में

बिहार में भूमि स्वामित्व विवाद और लंबे समय से कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा करने वाले मामलों में अदालतों ने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। रामबाबू प्रसाद बनाम अशोक कुमार (2013) में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह 30 वर्षों से भूमि पर खेती कर रहा था और करों का भुगतान कर रहा था। अदालत ने पाया कि कब्जा निरंतर था, लेकिन सार्वजनिक रूप से स्पष्ट प्रमाण की कमी के कारण दावा अस्वीकार कर दिया गया। शिवनाथ सिंह बनाम रामनरेश सिंह (2001) के मामले में याचिकाकर्ता ने 25 वर्षों तक जमीन पर मकान बनाकर कब्जा किया। अदालत ने इसे स्वीकृत किया क्योंकि कब्जा सार्वजनिक और स्पष्ट था, और मूल मालिक ने समय पर दावा नहीं किया।

बिहार राज्य बनाम गंगा देवी (2010) के मामले में याचिकाकर्ता ने 40 वर्षों तक सरकारी भूमि पर कब्जा किया और कृषि उपयोग का प्रमाण दिया। अदालत ने सरकारी निष्क्रियता के कारण इस मामले में Adverse Possession का दावा स्वीकार कर लिया। रामचंद्र ठाकुर बनाम राज्य (2005) में 15 वर्षों से भूमि पर खेती और कर भुगतान का दावा किया गया, लेकिन अदालत ने पाया कि कब्जा मूल मालिक की अनुमति से शुरू हुआ था, जिससे दावा अस्वीकार कर दिया गया।

चंद्रिका देवी बनाम बिहारी देवी (2007) के मामले में याचिकाकर्ता ने 20 वर्षों से अधिक समय तक भूमि पर घर बनाकर कब्जा किया। उसने ग्राम पंचायत से कर भुगतान का प्रमाण प्रस्तुत किया, और अदालत ने उसे स्वामित्व का अधिकार दिया। गणेश सिंह बनाम किशोर सिंह (1999) में याचिकाकर्ता ने भूमि को उपजाऊ बनाने और लंबे समय तक खेती करने का दावा किया। अदालत ने कब्जा निरंतर और सार्वजनिक माना, लेकिन असली मालिक के विवाद के कारण दावा खारिज कर दिया।

इन मामलों से स्पष्ट होता है कि बिहार में लंबे समय तक कब्जे के आधार पर स्वामित्व का दावा करने के लिए कब्जा सार्वजनिक, निरंतर और बिना रुकावट का होना चाहिए। कब्जे का प्रमाण, जैसे कर भुगतान, भूमि सुधार, और स्थानीय प्रशासन की स्वीकृति, दावा मजबूत करने में सहायक होते हैं। सरकारी भूमि पर Adverse Possession का दावा कठिन है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में इसे मान्यता दी जा सकती है।

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