धरधररिया डेम से संबंधित तत्कालीन व्यवस्थाओं पर किसानों का अभी भी भरोसा नहीं है कि उनके खेत की फसलें पूरी तरह से तैयार होंगी। जो व्यवस्था की गई है, वह कभी भी टूट सकती है, और कनाल में पानी की गति इतनी धीमी है कि ऐसा लगता है जैसे कछुआ और खरगोश की दौड़ हो रही हो 🐢🐇।
मीडिया रिपोर्ट्स में लगातार यह दावा किया जा रहा है कि जमुई का प्रशासन जीरो टॉलरेंस पर काम कर रहा है। लेकिन सवाल उठता है, क्या यह सिर्फ अखबारों तक सीमित है, या वाकई में जमुई का प्रशासन जीरो टॉलरेंस पर काम कर रहा है? यदि हां, तो फिर कला पंचायत के किसानों की समस्याएं क्यों नहीं हल हो रही हैं? क्यों नहीं हो रही है कनाल की सफाई?
हम कैसे समझें कि जमुई के जिला पदाधिकारी सच में जीरो टॉलरेंस पर काम कर रहे हैं? मेरा जिला प्रशासन से निवेदन है कि वे अपनी जीरो टॉलरेंस नीति का इस्तेमाल करके हमें भी राहत दिलाएं और हमारे खेतों तक पानी पहुंचाने में सहयोग करें 💧🙏।
अब कला पंचायत के किसानों का सब्र का बांध टूट रहा है। लघु जल संसाधन विभाग जमुई की लापरवाही के कारण उनके ऊपर एक आर्थिक बोझ तो पड़ ही रहा है, लेकिन अब मानसिक दबाव भी बढ़ रहा है। 500 एकड़ से अधिक भूमि की बात है। किसानों ने किसी तरह डीजल पंप चलाकर खेतों तक पानी पहुंचा दिया और धान की रोपाई कर दी है। लेकिन इतनी पूंजी लगाने के बावजूद, अगर उनके खेतों में फसल ठीक से नहीं होती है, तो इसका जवाब जिला प्रशासन और विशेषकर लघु जल संसाधन विभाग जमुई को ही देना पड़ेगा। उनकी लापरवाही की वजह से किसान आर्थिक संकट में हैं और अब मानसिक पीड़ा भी झेल रहे हैं 😔💸.
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