Saturday, May 11, 2024

पबना विद्रोह: जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ किसानों की आवाज़

 


1870 और 80 के दशक में पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के किसानों द्वारा किया गया पबना विद्रोह, औपनिवेशिक शासन के दौरान जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ एक महत्वपूर्ण विद्रोह था। यह विद्रोह शोषणकारी लगान (किराया) वसूली और किसानों के दयनीय हालात के विरुद्ध किसानों की बढ़ती बेचैनी का परिणाम था।

विद्रोह के कारण (Causes of the Revolt):

  • जमींदारों द्वारा मनमाना लगान वृद्धि: ब्रिटिश राज के दौरान, जमींदारों को लगान लगाने और बढ़ाने का व्यापक अधिकार था। कई मामलों में, उन्होंने अपनी आय बढ़ाने के लिए लगान में मनमाना वृद्धि कर दी, जिससे किसानों पर भारी बोझ पड़ गया।
  • अकाल और प्राकृतिक आपदाएं: इस दौरान आए अकाल और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने किसानों की स्थिति को और खराब कर दिया। फसल नष्ट होने के कारण लगान चुकाना उनके लिए असंभव हो गया।
  • सूदखोरों का शिकंजा: किसानों को अक्सर फसल उगाने और जीविका चलाने के लिए साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता था। ऊंची ब्याज दरों ने उनके कर्ज का बोझ बढ़ा दिया और उन्हें और अधिक गरीबी में धकेल दिया।

विद्रोह का नेतृत्व (Leadership of the Revolt):

पबना विद्रोह का नेतृत्व मुख्य रूप से ईशान चंद्र राय ने किया था, जिन्हें बाद में "विद्रोही राजा" के नाम से जाना गया। उन्होंने किसानों को एकजुट किया और जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाई।

विद्रोह का प्रभाव (Impact of the Revolt):

हालांकि ब्रिटिश सरकार ने अंततः विद्रोह को दबा दिया, लेकिन इसने जमींदारी व्यवस्था की क्रूरता को उजागर कर दिया। इस विद्रोह के बाद, बंगाल लगान अधिनियम, 1885 को लागू किया गया, जिसने कुछ हद तक काश्तकारों (किरायेदारों) के अधिकारों की रक्षा की।

पबना विद्रोह का महत्व (Significance of the Pabna Revolt):

पबना विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक शुरुआती अध्याय के रूप में देखा जाता है। इसने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध की मिसाल पेश की और भविष्य के किसान आंदोलनों को प्रेरित किया। यह विद्रोह हमें यह याद दिलाता है कि किसान भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

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