हरिशंकर परसाई की यह पंक्ति भारतीय समाज की एक बड़ी विडंबना को उजागर करती है। हमारे समाज में, लड़कों को अक्सर यह बताया जाता है कि सफल होने के लिए उन्हें धोखेबाज और चालाक होना चाहिए। वे ईमानदारी को कमजोर और निकम्मेपन का प्रतीक मानते हैं।
इस सोच के कई कारण हैं। एक कारण यह है कि हमारे समाज में सफलता को अक्सर पैसे और संपत्ति में मापा जाता है। जो लोग जल्दी से पैसा और संपत्ति कमाते हैं, उन्हें सफल माना जाता है। ऐसे लोगों को अक्सर ईमानदारी से काम करने का समय नहीं मिलता है। वे धोखा और चालाकी के सहारे जल्दी से सफलता हासिल करना चाहते हैं।
दूसरा कारण यह है कि हमारे समाज में ईमानदारी को अक्सर कमजोर और निकम्मेपन का प्रतीक माना जाता है। लोग अक्सर यह सोचते हैं कि ईमानदार लोग जीवन में संघर्ष करते हैं और उन्हें सफलता नहीं मिल पाती है। वे धोखेबाज और चालाक लोगों को अधिक सफल मानते हैं।
इस सोच का बच्चों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वे अपने माता-पिता और अन्य बड़े लोगों से यह सीखते हैं कि सफल होने के लिए उन्हें धोखेबाज और चालाक होना चाहिए। वे ईमानदारी को कमजोर और निकम्मेपन का प्रतीक मानते हैं।
यह सोच बहुत खतरनाक है। यह हमारे समाज को भ्रष्ट और विकृत बनाती है। यह बच्चों को ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों से दूर ले जाती है।
इस सोच को बदलने के लिए हमें बच्चों को ईमानदारी के महत्व के बारे में शिक्षित करना होगा। हमें उन्हें बताना होगा कि ईमानदारी ही वास्तविक सफलता की कुंजी है। हमें उन्हें यह भी बताना होगा कि धोखा और चालाकी से थोड़े समय के लिए सफलता मिल सकती है, लेकिन अंततः यह सफलता टिक नहीं पाती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपने समाज में ईमानदारी को महत्व दें। हमें उन लोगों को सम्मान देना चाहिए जो ईमानदारी से काम करते हैं। हमें उन्हें यह दिखाना चाहिए कि ईमानदारी से सफलता हासिल करना संभव है।
यदि हम इन प्रयासों को करते हैं, तो हम अपने बच्चों को एक ऐसे समाज में ला सकते हैं जहां ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों को महत्व दिया जाता है।
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