Thursday, January 25, 2024

काला पंचायत के किसानों की परेशानी, बदलाव की मांग!


भारत 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, संविधान में लिखे बड़े बड़े आदर्शों की बात की जा रही है, पर काला पंचायत की ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी सुनाती है। PACS (प्राथमिक कृषि सहकारी समिति) में ऐसी गड़बड़ियां हो रही हैं, जो सीधे किसानों को नुकसान पहुंचा रही हैं। सिर्फ भाषणों से ज़िंदगी नहीं बदलती, कुछ ठोस काम की ज़रूरत है।

किसान परेशान हैं क्योंकि PACS उनका धान तो ले लेता है, लेकिन कोई रसीद या सरकारी कागजात नहीं देता। बिना इन दस्तावेजों के क्या हुआ, कैसे हुआ, सब अंधेरे में है। ये सब देखकर किसान सोचते हैं कि क्या सरकार ने उनका सच्चा ख्याल रखा है? उनके साथ पारदर्शिता से बर्ताव होगा? जवाब दुखी करता है।

दूसरी बड़ी दिक्कत है धान बेचने के लिए सत्यापन करवाने में होने वाली देरी और मुश्किलें। हफ्तों, महीनों धान रखने के बाद भी किसान PACS के चक्कर लगाते रहते हैं। कभी "CC" (PACS के खाते में पैसा) नहीं होता, कभी कोई कर्मचारी नहीं मिलता।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। बिहार सहकारी समिति ने धान खरीदने का आदेश दिया था, लेकिन कळा PACS ने पहले मना कर दिया। सहकारी समिति के कॉल सेंटर पर शिकायत करने के बाद ही वो राज़ी हुए।

इसके अलावा ये भी पता नहीं चलता कि कितना धान PACS खरीदेगा। हफ्तों बाद अचानक कहते हैं कि ज़मीन के हिसाब से कम धान लेंगे। किसान की मेहनत का क्या? यही हाल काला

पंचायत के कई किसानों का है। PACS में कुछ बुनियादी गड़बड़ियां हैं, जिन्हें सुधारने की ज़रूरत है।

हमें डॉ. अंबेडकर की बात याद रखनी चाहिए, "किसी समाज की तरक्की मैं इस बात से नापता हूं कि औरतों को कितनी तरक्की मिली है।" अगर कृषि क्षेत्र की बात करें, तो ये हक और सुविधाएं किसानों को मिलनी चाहिए।

तो अब ज़रूरी है कि PACS को फिर से देखें, उसके कामकाज में पारदर्शिता लाएं, ज़रूरी हिसाब-किताब रखें, और नियमों का पालन करें। किसानों को एक ऐसा सिस्टम चाहिए जो उनका सम्मान करे, साफ-साफ बात करे, और उनकी मेहनत का सही दाम दे। गणतंत्र दिवस के आदर्शों को मानते हुए हमें कळा पंचायत और पूरे देश में किसानों के लिए एक बेहतर और न्यायपूर्ण कृषि व्यवस्था बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

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