दादा रविशानंद की यह कहानी सामूहिक संस्कार के महत्व को बेहद प्रभावी ढंग से उजागर करती है. 1960 के दशक में बाबा, कानपुर के पास एक गांव में गए. वहां से लगभग 100 साल पहले आए तूफान और बीमारी से कई लोगों की मृत्यु हो गई थी. ऐसे में एक व्यक्ति ने बाबा से पूछा कि यह अन्याय कैसे हुआ, इतने निर्दोष लोगों की जान क्यों चली गई?
बाबा ने उत्तर दिया कि वे लोग निर्दोष नहीं थे. उस समय 1857 का स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था (कानपुर इस युद्ध का प्रमुख केंद्र था). गांव के कुछ लोग अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने गए और वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन कई अन्य लोग घर बैठे आराम फरमाते रहे. बाबा ने कहा कि उनकी इस कायरता और निष्क्रियता के लिए प्रकृति ने उन्हें दंडित किया.
बाबा ने आगे कहा कि जब देश के नेता पापी होते हैं, तो जनता का कर्तव्य है कि क्रांति करके उन्हें सत्ता से बाहर निकाले. या कम से कम क्रांति का प्रयास करते हुए मर मिटें. यदि जनता अपने कर्तव्य से चूकती है, तो नेताओं के पाप जनता के पाप बन जाते हैं. कायरतापूर्ण चुप्पी से जनता नेताओं के पापों का समर्थन करती है और इसी पाप के कारण प्रकृति उन्हें दंड देती है.
कोई तथाकथित गुरु, परमहंस, संत ऐसी बात नहीं कहता. केवल धर्म गुरु ही ऐसी सच्ची शिक्षा देते हैं.
तो हमारे पास दो रास्ते हैं: या तो प्रकृति द्वारा भेजे गए प्राकृतिक आपदाओं में कायर की तरह मरना या फिर श्री श्री आनंदमूर्तिजी के सच्चे बेटे-बेटियों की तरह वीरगति को प्राप्त होना.
चुनाव हमारा है. हमारा भाग्य हमारे हाथों में है.
कृपया ध्यान दें:
यह अनुवाद यथासंभव मूल कथा और पाठ के अर्थ को बनाए रखते हुए किया गया है. धर्म, राजनीति, और इतिहास से जुड़े संवेदनशील विषयों को तटस्थ और सम्मानजनक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है.
No comments:
Post a Comment