छोटी परी को गोद में लेते ही खुशियों का ऐसा सैलाब उमड़ पड़ा, मानो दुनियाँ जगमगा उठी हो। अस्पताल का स्टाफ मुबारकबाद दे रहा था, मगर एक नर्स के शब्दों ने मानो खुशियों के दीप को धीमा कर दिया, "लड़की हुई है।"
ये कैसी परंपरा है जो बेटे और बेटी में भेद करती है? वही मातृत्व वार्ड, जहां एक सासू मां पोते की आस लगाए बैठी थीं, बहू को निराश भाव से देख रहीं थीं। क्या ममता का रिश्ता लिंग पर निर्भर है? क्या बेटी पैदा करना कोई कम उपलब्धि है?
फोन पर रिश्तेदारों और दोस्तों की बधाईयों में भी एक अजीब-सा अंदाज था। मानो मना रहे हों, "चलिये, लक्ष्मी आई है।" मेरे लिए तो ये फर्क ही नहीं था। मेरी पत्नी ने मुझे दो अनमोल रत्न दिए हैं, दो बेटियां।
पर समाज के ठेकेदारों को शायद ये मंजूर नहीं था। कुछ तो यहां तक कह गए, "दोनों बेटियों का दहेज देना पड़ेगा, पांच-पांच लाख!" इन बातों ने गुस्से से ज्यादा, दिल में एक गहरी चुभन पैदा की।
बेटियां लक्ष्मी नहीं, वो तो सूरज हैं!
बेटियां खुशियों का खजाना नहीं लातीं, वो खुद खुशियां बनकर आती हैं। मां-बाप का सहारा बनती हैं, हर कदम पर साथ देती हैं। बेटियों पर गर्व होना चाहिए, उन्हें शिक्षा देनी चाहिए, उन्हें वो बनने देना चाहिए जो वो बनना चाहती हैं।
पांच लाख दहेज में देने की बजाय, बेटी की शिक्षा पर ये रकम खर्च करें। उसे वो पंख दें, जिससे वो आसमान छू सके। एक शिक्षित बेटी सिर्फ अपना भविष्य नहीं संवारती, वो पूरे परिवार का नाम रोशन करती है।
बेटियां ही समाज की रीढ़ हैं, बेटियां ही देश का भविष्य हैं। आइए, इस सोच को बदलें। बेटियों को बराबरी का हक दें, उन्हें पढ़ाएं, उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं। यही सच्चा प्यार है, यही उनका असली हक है।
- #BetiHaiShaan (Daughter is Pride)
- #KanyadanNahiShikshaDan (Education, not Dowry)
- #LadkiWaleHumHai (We are Proud Parents of a Daughter)
- #EqualRightsForDaughters (Equal Rights for Daughters)
- #EducateTheGirlChild (Educate the Girl Child)
- #StopGenderBias (Stop Gender Bias)
- #ProudDad (Proud Dad)
- #MyDaughterMySunshine (My Daughter My Sunshine)
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