Friday, July 5, 2024

गीता के सार में: पति-पत्नी का युद्ध या सहयोग?


विवाह, स्वर्ग का प्रवेश द्वार है या कलह का रणक्षेत्र? कई बार ऐसा लगता है कि नवविवाहित दंपत्तियों के युद्ध का वर्णन महाभारत से कम ज्वाला-मय नहीं होता!

एक पत्नी के लिए मायका ममता का शीतल स्रोत होता है। वहां गुस्से का पारा थोड़ा नीचे उतरते ही, पैर वापस मायके की ओर बढ़ जाते हैं। पर क्या ये समाधान है? क्या "मैं मायके चली जाऊंगी" का वार्त्शल तीर, रिश्ते के कवच को भेदने के लिए बना है?

श्रीमद्भगवद्गीता कहती है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मआ फलेषु कदाचन। *" अर्थात कर्म ही हमारा अधिकार है, फल की कभी इच्छा नहीं करनी चाहिए।

इस श्लोक का सार रिश्ते पर भी लागू होता है। रिश्ते में जी-तोड़ मेहनत जरूरी है, हर परिस्थिति में साथ देना, समझदारी दिखाना, यही हमारा कर्म है। जीत या हार की भावना से रिश्ते में दरार ही पड़ेगी।

जब दुर्योधन होता है गुस्सा, द्रौपदी बनती है जिद

क्रोध तो दुर्योधन की तरह होता है, जो आँखों को अंधा कर देता है। वहीं जिद, द्रौपदी के चीर की तरह, रिश्ते को उघाड़ देती है। इन दोनों का युद्ध, रिश्ते के कुरुक्षेत्र में सिर्फ तबाही ला सकता है।

अर्जुन बनें, समाधान के लिए उठाएं धनुष

समस्या आने पर पत्नी को मायके पलायन का रास्ता छोड़, अर्जुन बनना चाहिए। समाधान का धनुष उठाना चाहिए। शांतचित्त होकर बातचीत करनी चाहिए।

पति को भी कठोर युधिष्ठिर नहीं बनना चाहिए। रिश्ते की रक्षा के लिए कभी माफी मांगने में भी कोई हर्ज नहीं।

गीता का संदेश है स्पष्ट: युद्ध नहीं, युधिष्ठिर और द्रौपदी जैसा सहयोग

गीता का संदेश स्पष्ट है। रिश्ते में युद्ध नहीं, बल्कि युधिष्ठिर और द्रौपदी जैसे सहयोग की आवश्यकता है। एक-दूसरे का सम्मान करें, कठिनाइयों में साथ दें, खुशियों को बाँटें। यही वह धर्म है, जो गीता हमें सिखाती है।

तभी तो विवाह स्वर्ग का प्रवेश द्वार बन पाएगा, ना कि कलह का रणक्षेत्र।

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