Thursday, April 24, 2025

उसने ‘moobA’ कहा और मेरी दुनिया रुक गई"



शीर्षक: मेरी छोटी सी खुशी – हमारे 962 दिन और वो एक खास लम्हा

6 सितंबर 2022 को जब वो आई थी, तब से अब तक 962 दिन और 23,088 घंटे बीत चुके हैं। लेकिन सच कहूँ, हर दिन एक नया एहसास लेकर आया है। हर पल जैसे ज़िंदगी की नई परिभाषा बन गया है। वो मेरी बेटी नहीं, मेरी साँसों की लय है, मेरी आँखों की चमक और दिल की धड़कन है।

कुछ दिन पहले पास में एक प्रोग्राम था। ढोल-नगाड़ों की गूंज, संगीत की लहरें, और चारों तरफ मस्ती का माहौल। लोग नाच रहे थे, सेल्फियाँ ले रहे थे। मैं भी वहीं खड़ा था। इतने में मेरी नन्ही परी मेरे पास आई और बोली – "moobA moobA..."
पहले तो मैं कुछ समझ नहीं पाया। उसकी आँखों में देखा, चेहरे पर उत्सुकता थी। धीरे से पूछा, "मोबाइल माँग रही हो, बेटा?"
उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया – हाँ।

हमारे बीच एक प्यारा संवाद हुआ, जिसमें शब्द कम थे लेकिन समझ गहरी थी। वो मोबाइल लेकर उस जगह गई जहाँ सब नाच रहे थे। थोड़ी देर बाद वापस आई और बोली – "पापा… पाप ईई करो…"

वो कहना चाह रही थी – "कैमरा ऑन करो।"
उसने खुद कोशिश की, लेकिन जब नहीं हो पाया तो मेरे पास आई। मैंने कैमरा ऑन किया, और वो फिर चल पड़ी।
उसके छोटे-छोटे हाथों में मोबाइल, मासूम आँखों में चमक, और दिल में जिज्ञासा — वो पल हमारे लिए सिर्फ एक क्लिक नहीं, एक जीवित याद बन गया।

उसने खुद कैमरा पकड़कर अपने दोस्तों के साथ फोटो ली। कभी स्क्रीन बंद हो गया, कभी मोबाइल गिरा — लेकिन उसने हार नहीं मानी। बार-बार उठाई, बार-बार कोशिश की। वो जिद नहीं थी, वो सीखने की लगन थी।
फिर जब म्यूजिक बजा, तो वो भी सबके साथ नाचने लगी। हम दोनों ने साथ बैठकर उसका डांस देखा — एक पल हँसी आई, तो अगले ही पल आँखें नम हो गईं।

हमारा वो पल सिर्फ एक घटना नहीं थी, वो हमारी ज़िंदगी की सबसे भावुक झलक थी। जहाँ मैंने देखा कि मेरी बेटी अब नन्हें कदमों से इस दुनिया को समझ रही है, सीख रही है, और सबसे बड़ी बात — अपने पापा से एक अटूट रिश्ता बना रही है।

कभी-कभी सोचता हूँ, इन 962 दिनों में मैंने क्या सीखा?
जवाब आता है — "बिलकुल वही जो उसने सिखाया – प्यार, मासूमियत, और न रुकने वाली कोशिशें।"



No comments: