जमुई (बिहार): आजकल तो लोग बिना AC के जीना भूल चुके हैं, लेकिन जमुई की झूला देवी बिना बिजली के ही छह साल से 'डार्क मोड' में जी रही हैं! साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (एसबीपीडीसीएल) की 'चमकदार' लापरवाही ने इस बुजुर्ग महिला को अंधेरे की गोद में धकेल दिया है।
"बेटा, बिजली नहीं, पर बिल तो आता है!"
झूला देवी ने पहली शिकायत 2019 में की थी, लेकिन एसबीपीडीसीएल वाले तो शायद 'ऑफलाइन' हो गए। 2024 में दूसरी शिकायत की, तो अधिकारियों ने कहा—
"माई, हम तो सिर्फ बिल भेजने के लिए हैं, बिजली देने के लिए नहीं!"
उनके बेटे ने बताया,
"अम्मा को बिजली नहीं मिली, पर एसबीपीडीसीएल वाले हर महीने बिल का मैसेज जरूर भेज देते हैं। शायद उन्हें लगता है कि अंधेरे में बैठकर मोबाइल चलाने से बैटरी खत्म हो जाती है, इसलिए बिल भेजना जरूरी है!"
अधिकारियों का 'ज्ञान'
पिछली बार जब झूला देवी ने शिकायत की, तो अधिकारियों ने उन्हें कागज पर डायग्राम बनाकर समझाया—
"देखो माई, यहाँ तुम्हारा मीटर है, यहाँ तार है, यहाँ बिजली आनी चाहिए..."
झूला देवी ने पूछा—
"तो फिर बिजली आ क्यों नहीं रही?"
जवाब मिला—
"अरे, यह तो हमें भी नहीं पता!"
"अंधेरे में भी दिखता है अधिकारियों का चेहरा!"
झूला देवी कहती हैं—
"बेटा, इतने साल से अंधेरा हो गया है कि अब तो हमें अधिकारियों का चेहरा भी अंधेरे में दिखने लगा है! वो कहते हैं 'विद्युत लोकपाल' के पास जाओ, पर हम तो सोच रहे हैं—कहीं ये 'लोकपाल' भी अंधेरे में तो नहीं बैठे हैं?"
अब क्या होगा?
झूला देवी ने अब विद्युत लोकपाल के पास शिकायत की है। पर वो चिंतित हैं—
"अगर लोकपाल ने भी कह दिया कि 'हम तो सिर्फ सुनने के लिए हैं, बिजली देने के लिए नहीं', तो फिर?"
निष्कर्ष: 'अंधेरा' या 'अंधाधुंध' व्यवस्था?
एसबीपीडीसीएल की यह कहानी साबित करती है कि बिजली कटौती तो हो सकती है, लेकिन लापरवाही कभी नहीं कटती! सरकार को इस 'अंधेरे मामले' पर तुरंत रोशनी डालनी चाहिए, नहीं तो झूला देवी को अब मोमबत्ती बेचने का बिजनेस शुरू करना पड़ेगा!
क्या आपके इलाके में भी अधिकारी 'अंधेरे' में काम करते हैं? हमें कमेंट में बताएँ!
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