भूमिका
हमारे गाँव की मिट्टी में वो सोंधी खुशबू है जो बारिश के बाद उभरती है, लेकिन आज यही मिट्टी हमारी गंदगी और हमारे कुछ स्वार्थी लोगों की दलदल में धँसती नज़र आ रही है।
काला पंचायत की यह कहानी सिर्फ एक नाले के निर्माण की नहीं, बल्कि उन "धार्मिक चौकीदारों" की भी है जो हमारे विकास की दीवारें गिराकर अपनी सत्ता का महल बनाने में लगे हैं।
धर्म की दुकान या हमारी गंदगी का धंधा?
जब हमारे गाँव काला में नाले का निर्माण शुरू हुआ, तो कुछ "धर्म के रखवाले" सिंहनाद करते हुए सामने आए।
उन्होंने भाड़े के लोगों को भेजकर हमारे सामूहिक सपनों की नींव तुड़वा दी।
यह कैसी आस्था है जो मंदिर की दीवार से 3 फीट दूर बनने वाले नाले को "अपवित्र" बताती है,
लेकिन हमारे ही मंदिर के आँगन में जमा गंदे पानी को "भगवान की मर्जी" समझती है?
सवाल यह नहीं है कि नाला बने या न बने — सवाल यह है कि क्या आस्था इतनी नाज़ुक हो गई है कि तीन फीट दूर बहता साफ़ पानी उसे डगमगाने लगे, लेकिन उसी आस्था को मंदिर के सामने बहती गंदगी ‘दिव्य अनुभूति’ लगती है?
हमारी आस्था या उनका अवसरवाद?
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हमारा मंदिर:
जहाँ बारिश के दिनों में हमारे भोला बाबा की मूर्ति गंदे पानी में डूबी रहती है — वहाँ ये "धर्मरक्षक" चुप क्यों हैं?
क्या भगवान सिर्फ निर्माण के समय ही याद आते हैं? -
हमारा अस्पताल:
गाँव का वह सरकारी अस्पताल, जहाँ हमारे बुजुर्ग इलाज कराते हैं — वहाँ बारिश में हमारे ही नाले का पानी उनके बिस्तरों तक पहुँच जाता है।
क्या यही है धर्म की सेवा? -
हमारी आंगनबाड़ी:
जहाँ हमारे बच्चों को पहला अक्षर सिखाया जाता है — वहाँ उनकी पहली चाल गंदगी में फिसलती है।
क्या हमारे नन्हे फूलों का भविष्य इन ठेकेदारों के हाथों मुरझाएगा?
"विकास विरोधी" वो, जिनके बच्चे भी हमारे ही गंदे रास्ते चलते हैं!
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नाले के विरोध करने वालों के अपने बच्चे भी हमारे गाँव के उसी रास्ते स्कूल जाते हैं,
उनके बुजुर्ग भी हमारे अस्पताल में इलाज कराते हैं।
तो फिर विरोध किसके लिए?
जवाब साफ है:
यह स्वार्थ की लड़ाई है, जहाँ हमारी गंदगी को बनाए रखकर उनकी राजनीति की फसल काटी जाती है।
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