हमारे काला पंचायत में कुछ ऐसे धार्मिक ठेकेदार पैदा हो गए हैं, जिनकी आस्था तभी जागती है जब विकास का कोई काम शुरू होता है। जब गांव का गंदा पानी भोला बाबा और पार्वती मां के मंदिरों में जमा हो जाता है — जो कि नाले से लगभग 20 फीट की दूरी पर हैं — तब ये लोग कहीं दिखाई नहीं देते। बारिश का पानी मंदिर के भीतर तक भर जाता है, कीचड़ फैल जाता है, लेकिन तब इनका धर्म और सम्मान दोनों गहरी नींद में होता है।
अब पंचायत प्रतिनिधियों ने एक बेहतर जल निकासी की योजना शुरू की है। एक पुराना मंदिर, जो नाले से महज 2-3 फीट की दूरी पर है, वहां से होकर यह नाला गुज़रेगा — मंदिर को कोई नुकसान नहीं है। फिर भी वही कुछ लोग, जिनकी राजनीति नालों और गंदगी में पलती है, इस पर आपत्ति जता रहे हैं।
ये वही लोग हैं, जो कुछ साल पहले आंगनबाड़ी केंद्र के निर्माण में भी बाधा डाल चुके हैं। उस समय भी इनके पास कोई तर्क नहीं था — बस विरोध करना था, ताकि अपने नेताओं की नजरों में बने रहें।
अरे भाई, ये नाला सिर्फ बारिश का पानी बहाने के लिए है — कोई नालियों का सीवर नहीं है। ये सोचना कि इससे लदरिंग, कूड़ा-कचरा सब आपके दरवाज़े पर आ जाएगा, महज़ ओवरथिंकिंग है। असल में समस्या पानी की नहीं, सोच की है।
आज स्थिति यह है कि कुछ लोगों को आदत पड़ गई है — उनके घर के सामने दो महीने तक बारिश का पानी जमा रहे, उसमें बदबू फैले, मच्छर पनपें, लेकिन फिर भी वे उसी में पैर धोते हैं और खुश रहते हैं — जैसे वह कोई अमृत हो!
और जब कोई समाधान की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो वही लोग धर्म, राजनीति और निजी स्वार्थ की मिलीभगत से उसे रोकने में लग जाते हैं।
हमारे पंचायत की जनता अब सब समझ रही है। अब समय आ गया है कि हम ऐसे मानसिक गुलामों की बातों में न आकर, विकास के रास्ते पर आगे बढ़ें।
अस्वीकरण:
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी अनुभवों और स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य केवल सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करना है। इसमें उल्लिखित किसी भी व्यक्ति, संस्था या धार्मिक स्थल को बदनाम करना या उनकी भावना को ठेस पहुँचाना कतई उद्देश्य नहीं है। यदि किसी को इसमें कोई आपत्ति हो, तो कृपया इसे संवाद का माध्यम समझें न कि टकराव का। लेखक समाज और पंचायत के समग्र विकास का समर्थक है।
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