परिचय
भारत में न्याय प्रक्रिया वैसे ही कछुआ चाल से चलती है, लेकिन जब कोई पुलिस अधिकारी 18 केस की फाइलें अपने पास रखकर 16 साल तक “जांच” करता रहे, तो लगता है कि यह कोई जांच नहीं बल्कि एपिक वेब सीरीज है – सीज़न दर सीज़न, लेकिन क्लाइमैक्स कभी नहीं आता।
मुख्य किरदार: दुबे देवगुरु जी
2009 से लेकर 2025 तक, दुबे देवगुरु जी का नाम पुलिस विभाग में ‘मिस्ट्री मास्टर’ की तरह लिया जाता है। साहब ने लक्ष्मीपुर, बरहट, झाझा, और फिर कहलगांव तक जांच का जाल बिछाया, लेकिन चार्जशीट? “अभी जांच चल रही है बाबू!”
चार्जशीट: एक अधूरी प्रेम कहानी
सुप्रीम कोर्ट कहता है कि चार्जशीट 90 दिनों में कोर्ट में होनी चाहिए।
देवगुरु जी कहते हैं:
“हमारी जांच में भावना है, गहराई है, वक्त लगता है... 90 दिन में क्या होगा?”
लक्ष्मीपुर, बारहट , झाझा थाना अब 18 केसों के साथ ‘फाइलों का अनाथालय’ बन चुका है। हर केस की फाइल दिन गिन रही है कि कब उसे कोर्ट में पेश होने का सौभाग्य मिलेगा।
स्थानांतरण या फाइल-मुक्ति यात्रा?
2017 में जब देवगुरु जी का ट्रांसफर हुआ, तो फाइलें भी उनके साथ चली गईं। अब ये केस उन पुराने कपड़ों की तरह हो गए हैं जिन्हें कोई पहनता नहीं, लेकिन अलमारी से निकालता भी नहीं।
और मज़े की बात यह – किसी नए अफसर को वो फाइलें सौंपी भी नहीं गईं! सिस्टम भी सोच में पड़ गया – “इन केसों का वारिस कौन?”
पीड़ित पक्ष की हालत: न्याय नहीं, टाइमपास मिल रहा है
पीड़ित लोग आज तक यह इंतजार कर रहे हैं कि फाइल कोर्ट पहुँचेगी, फिर सुनवाई होगी, फिर न्याय मिलेगा। लेकिन देवगुरु जी की जांच की रफ्तार देखकर तो हाफ मैराथन वाले भी फिनिश लाइन पार कर लें, पर केस वहीं खड़ा मिले।
मजेदार कल्पना: अगर Netflix पर "देवगुरु की चार्जशीट" आती तो...
- एपिसोड 1: पहली एफआईआर की यादें
- एपिसोड 9: जांच में आई बरसाती रुकावटें
- एपिसोड 18: “फाइल कहाँ है?” – एक थाने की चिल्लाहट
- स्पेशल एपिसोड: कोर्ट का समन और देवगुरु जी की चाय
निष्कर्ष: ये मज़ाक नहीं, सच्चाई है
जहाँ एक ओर पुलिस विभाग की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियाँ उड़ती नजर आती हैं। ऐसी लापरवाही न केवल कानून का अपमान है, बल्कि हज़ारों पीड़ितों के विश्वास को तोड़ने जैसा है।
प्रश्न सरकार और पुलिस महकमे से:
- जब अधिकारी ट्रांसफर हो जाएं, तो जांच फाइलें साथ क्यों जाती हैं?
- पीड़ित पक्ष को कब तक "जांच जारी है" का बहाना सुनना पड़ेगा?
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन ज़मीन पर कौन सुनिश्चित करेगा?
अगर आपके पास भी ऐसे 'जांच-योद्धाओं' की कहानी है, तो ज़रूर साझा कीजिए। कौन जाने अगला एपिसोड उन्हीं पर बन जाए!
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह ब्लॉग दैनिक भास्कर समाचार पत्र के आज के e-संस्करण में प्रकाशित समाचार पर आधारित है। इसमें प्रस्तुत तथ्य, घटनाएं और व्यक्तित्व संबंधित जानकारी दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार संकलित की गई है।
इस ब्लॉग को मैंने व्यंग्य और हल्के-फुल्के हास्य के साथ लिखा है, ताकि पाठक गंभीर विषयों पर सोच सकें और साथ ही मुस्कुरा भी सकें। मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था का अपमान करना नहीं है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाहियों को एक नए अंदाज़ में उजागर करना है।
मूल समाचार का श्रेय दैनिक भास्कर को जाता है, और संपादकीय जिम्मेदारी उनके द्वारा वहन की जाती है।
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