Thursday, April 25, 2024

बेटी विदा, पर खुशी कहाँ?


हाल ही में एक शादी में शामिल हुआ। बेटी को विदा करते वक्त पिता की आँखों में छलकते आंसू देखे, तो दिल दहल गया। एक तरफ खुशी थी कि बेटी सुखी जीवन की ओर कदम बढ़ा रही है, तो दूसरी तरफ ये सोचकर गम भी हुआ कि अब घर सूना हो जाएगा।

लेकिन शादी के बाद रिश्तेदारों की बातें सुनकर गुस्सा भी आया। वो सब ट्रक में झाँक रहे थे, ये देखने के लिए कि दहेज में क्या आया है। मानो बेटी कोई चीज हो, जिसे खरीदा जा सके।

आजकल कुछ शादियों में तो और भी बुरा हाल देखने को मिलता है। दूल्हे वालों को महंगी गाड़ियाँ, ढेर सारे इलेक्ट्रॉनिक सामान चाहिए होते हैं। ये सब दिखावे के लिए तो ठीक है, पर क्या उन्हें पता है कि ये चीजें चलाना भी आता है? अक्सर ये दूल्हे बेरोजगार होते हैं, शादी के बाद जल्दी ही बच्चे हो जाते हैं। फिर वो गाड़ियाँ उनके बाप चलाते हैं, क्योंकि उन्हें नौकरी की तलाश में दूसरे शहर जाना पड़ता है।

बेटी के चले जाने के बाद पिता पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। अकेलापन, बीमारियाँ, आर्थिक तंगी... ये सब उन्हें घेर लेते हैं। भारी कर्ज के बोझ तले दबे वो रोटी, दाल जैसी बुनियादी चीजों के लिए भी तरसने लगते हैं।

अपने आसपास ऐसे कई मामले देखे हैं। कुछ बारातियों के पिताओं ने तो शान दिखाने के लिए 20  स्कॉर्पियो बुक कर ली, पर उनके पास इतने मेहमान भी नहीं थे कि गाड़ी भर जाए!

ये कैसा दिखावा है? ये कैसी शादियाँ हैं, जो रिश्तों को तोड़ती हैं और खुशियाँ छीन लेती हैं?

काश! समाज थोड़ा बदल पाता। बेटियों को सम्मान मिलता, दहेज का ख़त्म होता और शादियाँ खुशियों का सबब बनतीं।

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