Sunday, April 21, 2024

एक भाई का दर्द: बहन का घर अब पराया!


आज मेरी कलम कागज पर बहते हुए आँसू बनकर बह रही है। वो घर, जहाँ कभी मेरी प्यारी बहन की हँसी गूंजती थी, आज वीरान है। वो दहलीज, जिसे कभी वो अपने पायल की छन-छन से सजाती थी, आज उसकी राह देख रही है। मेरी प्यारी बहन, जो कभी पापा की लाडली और मेरी सबसे प्यारी दोस्त थी, आज एक पराई बनकर रह गई है।

कौन जाने किस क़िस्मत का खेल है कि जिस घर से वो डोली उठाकर अपने सपनों के घर की ओर चली थी, आज उसी घर का रास्ता उसके लिए बंद हो गया है। वो अब भी कभी-कभी उस गाँव में आती है, पर वो दहलीज अब उसके लिए पराई हो गई है।

यह सब कुछ साला और बहनोई के बीच हुए आपसी मतभेदों की वजह से है। काश हमारे माता-पिता जीवित होते तो शायद यह सब नहीं होता। वो दोनों ही इतने प्यार करने वाले थे कि कभी भी अपनी बेटी को ऐसे दर्द में नहीं देखना चाहते थे।

मेरी माँ, जिसने अपनी कोख से मेरी बहन को जन्म दिया था, क्या वो ये बर्दाश्त कर पाती? वो अपनी बेटी को पराए घर की रोटी खाते हुए कैसे देख पाती? वो अपने दामाद के गलत व्यवहार को कैसे सहन कर पाती?

लेकिन अब क्या? माता-पिता नहीं रहे और मेरी बहन मजबूर है। जीजा के गलत कामों का विरोध करने पर उसे डर लगता है। वो जानती है कि अगर वो विरोध करेगी तो वो उसे दुबार तकलीफ देगा।

मेरी बहन, जो कभी इतनी हँसमुख और खुशमिजाज थी, आज एक उदास और परेशान औरत बनकर रह गई है। वो अपने भाई को देखकर रोती है, पर उसकी मजबूरी उसे चुप रहने पर मजबूर कर देती है।

काश मैं कुछ कर पाता। काश मैं अपनी बहन को उस दर्द से निकाल पाता। पर मैं भी मजबूर हूँ। मेरे पास कोई साधन नहीं है, कोई ताकत नहीं है।

बस यही दुआ है कि एक दिन मेरी बहन को हिम्मत मिलेगी और वो अपने जीजा के गलत कामों का विरोध करेगी। वो अपनी आज़ादी वापस पाएगी और उस घर में वापस आएगी जहाँ वो कभी रानी थी।

यह सिर्फ़ एक कहानी है, पर ऐसे अनेक भाई-बहन हैं जो अपनी बहनों के दर्द को समझते हैं।

आइए हम सब मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाएं जहाँ हर बहन को सम्मान और सुरक्षा मिले।

No comments: