इलेक्टोरल बॉन्ड, चुनावों में पार्टियों को चंदा देने का एक तरीका, पिछले कुछ समय से काफी विवादों में रहा है। इसके समर्थकों का दावा है कि यह चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाएगा, जबकि विरोधियों का कहना है कि यह धन शोधन और अज्ञात स्रोतों से धन प्राप्त करने का एक साधन बन गया है।
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन इस व्यवस्था में कुछ खामियों को भी स्वीकार किया। कई खोजी रिपोर्टों ने भी इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में कई चिंताएं जताई हैं।
लेकिन इन तर्कों के बावजूद, सोशल मीडिया पर इलेक्टोरल बॉन्ड के पक्ष में कई झूठे दावे किए जा रहे हैं। इन दावों को अक्सर "व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी" में साझा किया जाता है, जहां लोग बिना सोचे-समझे इन पर विश्वास कर लेते हैं।
इन झूठे दावों में से कुछ इस प्रकार हैं:
- इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदे में पारदर्शिता आई है।
- इलेक्टोरल बॉन्ड से धन शोधन को रोका गया है।
- इलेक्टोरल बॉन्ड से छोटे दलों को भी चुनाव लड़ने में मदद मिली है।
इन दावों का कोई आधार नहीं है। वास्तव में, इलेक्टोरल बॉन्ड ने चुनावी चंदे में पारदर्शिता कम कर दी है। दानदाताओं की पहचान गुप्त रहती है, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस पार्टी को कितना पैसा दे रहा है।
इलेक्टोरल बॉन्ड धन शोधन का भी एक साधन बन सकता है। दानदाता अपनी पहचान छुपाकर अवैध धन को चुनावी चंदे में बदल सकते हैं।
इलेक्टोरल बॉन्ड से छोटे दलों को कोई मदद नहीं मिली है। बड़े दलों को ही सबसे ज्यादा फायदा हुआ है।
यह चिंता की बात है कि गृहमंत्री अमित शाह भी इलेक्टोरल बॉन्ड के पक्ष में झूठे दावे कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनावी चंदे में पारदर्शिता आई है, जबकि यह सच नहीं है।
यह जरूरी है कि हम इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में सच जानें और झूठे दावों से सावधान रहें।
सच जानने के लिए आप इन स्त्रोतों का उपयोग कर सकते हैं:
- चुनाव आयोग: https://eci.gov.in/
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स: https://adrindia.org/
- केंद्र सरकार: https://www.india.gov.in/
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