यह कथन मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास "गोदान" से लिया गया है। यह कथन गरीबी और शोषण की त्रासदी को दर्शाता है। यह कथन कहता है कि जब कोई हमारी रोजी-रोटी छीन लेता है, तो उसे वापस पाना हमारा धर्म बन जाता है।
इस कथन में, प्रेमचंद जी ने गरीबों की पीड़ा और लाचारी को उजागर किया है। गरीब लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए संघर्ष करते हैं। यदि कोई उनकी रोजी-रोटी छीन लेता है, तो उनके लिए जीवित रहना मुश्किल हो जाता है।
इस कथन में, प्रेमचंद जी ने यह भी कहा है कि गरीबों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए। जब कोई उनका शोषण करता है, तो उन्हें चुप नहीं बैठना चाहिए। उन्हें अपनी आवाज उठानी चाहिए और अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए।
यह कथन आज भी प्रासंगिक है। आज भी कई गरीब लोग हैं जिनका शोषण होता है। उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस कथन से हमें प्रेरणा मिलती है कि हमें गरीबों के साथ खड़े होना चाहिए और उनके अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए।
इस कथन के कुछ महत्वपूर्ण पहलू:
- गरीबी और शोषण की त्रासदी
- गरीबों की पीड़ा और लाचारी
- गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ने की आवश्यकता
- आज भी इस कथन की प्रासंगिकता
इस कथन से हमें क्या सीख मिलती है?
- हमें गरीबों के साथ खड़े होना चाहिए और उनके अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए।
- हमें गरीबी और शोषण के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
- हमें एक न्यायपूर्ण और समान समाज बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
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