ए भाई लोग, कान खोल के सुनो! जमुई जिला के लक्ष्मीपुर प्रखंड में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवावे के चक्कर में जनता की हालत भैंस के सींग जइसन हो गइल बा - टेढ़ा आ बेकार। सरकार चिल्लावत बा कि "सब आसान बनाई, सब पारदर्शी करी," लेकिन इहाँ तो जनता के पंचायत के गली से ब्लॉक के दफ्तर तक भकुर-भकुर दौड़वाला जा रहा। ई का नौटंकी बा, भगवान जाने!
मुद्दा का बा, भाई?
फॉर्म में लिखल बा कि मृत्यु प्रमाण पत्र खातिर मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य आ पंच के साइन जरूरी बा, जइसे कवनो शादी के कार्ड छपवावत होई! लेकिन जब ब्लॉक ऑफिस के जिम्मा बा ई कागज बनावे के, त जनता के पंचायत के चक्कर काहे लगवावत बाड़ू? ऊपर से पोस्टमार्टम रिपोर्ट हाथ में होखे त ऊ का कम बा? फिर भी साइन के पीछे भागम-भाग काहे?
अरे, अगर कवनो बेचारा हॉस्पिटल में चल बसी, पोस्टमार्टम हो गइल, त ई त सरकारी मुहर वाला सबूत बा। फिर काहे खातिर पंचायत के बाबू लोग के साइन लेवे के नौटंकी? पोस्टमार्टम त डॉक्टर आ थानेदार सत्यापित करेलन, फिर भी गाँव के मुखिया-सर्पंच के दरबार में हाजिरी काहे? हॉस्पिटल से मृत्यु कागज मिल गइल त ऊपर से ई ड्रामा काहे? ई तो साफ लागत बा कि जनता के तंग करे आ जेब ढीला करवावे के खेल चल रहा!
अधिकारी लोग का गाना गावत बा?
हम जब दफ्तर में पूछतानी, त ऊ लोग बोललन, "मृत्यु प्रमाण पत्र ब्लॉक से बनेला, लेकिन पहले पंचायत जाके साइन लेआ!" अरे भाई, ई का तमाशा बा? जनता के ऊँट के पीछे बइठाके रेगिस्तान में छोड़ देले बाड़ू का?
जनता के दुखड़ा:
1. पंचायत सचिव का करत बा? - अगर ऊ रिकॉर्ड संभाले आ काम आसान बनावे खातिर बइठल बा, त जनता खुद साइन काहे ढोवे जाला? ऊ त चाय पीके कुर्सी गरम करत बा!
2. गाँव के नेता के ड्रामा काहे? - मृत्यु प्रमाण पत्र त कानूनी कागज बा, कवनो फिल्मी स्क्रिप्ट ना कि हीरो लोग के साइन चाही!
3. गरीब के कमर टूट गइल - सादा लोग, खासकर अनपढ़ आ गरीब, ई भूलभुलैया में फँस जाला आ दलाल के जेब में पैसा डाले के मजबूरी हो जाला।
4. कानून के मजाक - जन्म-मृत्यु कानून कहत बा कि ई कागज ब्लॉक या नगर निकाय बनावे, त पंचायत के साइनचोर लोग काहे बीच में नाचत बा?
5. पोस्टमार्टम के बाद भी सतावे - जब सरकारी कागज तैयार बा, त पंचायत के साइन के झमेला काहे बा?
ई सब के इलाज का बा?
-पंचायत सचिव के ठोकल जाय - जनता के भगावे के बजाय ऊ खुद सत्यापन करके ब्लॉक में कागज फेंके!
-ऑनलाइन जादू चलावल जाय - मोबाइल से आवेदन होखे, त साइन खातिर गाँव-गली में धक्का ना खाये पड़ी।
पोस्टमार्टम ही हीरो बन जाय - अगर रिपोर्ट बा, त ऊपर से साइन के सर्कस बंद होखे।
भ्रष्टाचार के बैंड बजा दिहल जाय - प्रक्रिया चमकदार होखे, त कवनो "चाय-पानी" के चक्कर ना चले!
अंत में दो टूक बात
ई मृत्यु प्रमाण पत्र के खेल बस कागज लेने तक ना बा, बल्कि अफसरशाही के बकलोली आ जनता के साँस फुलावे के कहानी बा। अगर सरकार सुशासन के ढोल पीटत बा, त ई बेकार के नाटक बंद करके मृत्यु प्रमाण पत्र के रास्ता साफ आ सुघर बनावे के चाही। ना त जनता त दौड़त रह जाई, आ अफसर लोग कुर्सी पर मूँछ ऐंठत तमाशा देखत रह जाई! ए भाई, अबकी बारी सुधार के बारी!
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