Friday, February 7, 2025

काला पंचायत पैक्स केंद्र, लक्ष्मीपुर जमुई बिहार – योजनाओं का झूठ और किसानों का संघर्ष


प्रिय पाठकों,

जमुई जिले के लक्ष्मीपुर में काला पंचायत के पैक्स केंद्र की कहानी सिर्फ एक गाँव की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की दास्तान है। एक तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार "प्रगति यात्रा" के तहत जमुई में कई योजना  की घोषणाएं कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पैक्स केंद्र जैसी पुरानी योजनाएं अधिकारियों की लापरवाही के कारण धराशायी हो रही हैं। यह सवाल उठता है: क्या विकास केवल मंचों से की गई घोषणाओं तक सीमित है?

जब सिस्टम ने किसानों का साथ छोड़ दिया
लक्ष्मीपुर के पैक्स केंद्र का मकसद किसानों को उनकी फसल का उचित दाम दिलाना था, लेकिन आज यही केंद्र उनकी मजबूरी बन गया है। किसान दिबाकर पांडेय इसका जीवंत उदाहरण हैं। उन्होंने MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर धान बेचने के लिए पैक्स केंद्र का रुख किया, लेकिन अधिकारियों ने महीनों से उन्हें टालमटोल का जवाब दिया। "कागजात पेंडिंग है," "कोटा खत्म हो गया है," या "उच्च अधिकारियों से अनुमति लेनी है" जैसे बहाने उनकी आशाओं को तोड़ रहे हैं। दिबाकर की फसल अब गोदामों में सड़ रही है, और कर्ज का बोझ उनके सिर पर मंडरा रहा है।

नेताओं की "प्रगति" और ज़मीन की सच्चाई
मुख्यमंत्री की यात्रा के दौरान जमुई में जिस जोशोखरोश से योजनाओं का ऐलान किया गया, उसकी चकाचौंध के पीछे पैक्स केंद्र जैसी योजनाओं का काला सच छिपा है। नेता और अधिकारी "प्रगति" की रंगीन तस्वीरें दिखाकर जनता को भरमाने में लगे हैं, लेकिन जमीन पर काम करने वाले किसानों के साथ हो रहा अन्याय किसी को दिखाई नहीं देता। दिबाकर जैसे किसानों के लिए MSP सिर्फ एक कागजी वादा बनकर रह गया है।

काला पैक्स केंद्र: भ्रष्टाचार का अड्डा
इस केंद्र का नाम "काला पंचायत" क्यों पड़ा, यह समझना मुश्किल नहीं। यहाँ धान खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ आम हैं। किसानों के दस्तावेजों को जानबूझकर लटकाया जाता है, कोटे का नाम पर दलालों को धान बेचा जाता है, और ईमानदार किसानों को झूठे आश्वासनों में उलझाया जाता है। दिबाकर पांडेय का सवाल है: "जब सरकार MSP की गारंटी देती है, तो काला पैक्स केंद्र हमें उसका लाभ क्यों नहीं दे रहा? क्या हमारी मेहनत की कीमत सिर्फ भ्रष्ट अधिकारियों की जेब भरना है?"

प्रशासन की खामोशी और किसानों की चीख
जिला प्रशासन और कृषि विभाग ने इस मामले में गजब की खामोशी साध रखी है। दिबाकर ने कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन हर बार उन्हें यही जवाब मिला: "हम जाँच कर रहे हैं।" सवाल यह है कि यह "जाँच" कब तक चलेगी? क्या किसानों के पास इतना समय है कि वे अधिकारियों की सुविधा के हिसाब से अपनी फसल बर्बाद होते देखते रहें?

आखिर कब तक सहेंगे किसान?

लक्ष्मीपुर का यह मामला सिर्फ एक गाँव की कहानी नहीं है। बिहार के कई जिलों में पैक्स केंद्रों पर ऐसी अनियमितताएं आम हैं। सरकारी योजनाएं कागजों पर चमकती हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर शून्य होता है। किसानों को न तो MSP मिल रहा है, न ही उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है: क्या यह व्यवस्था किसानों के खिलाफ साजिश है?

पाठकों से सीधा सवाल

अगर आपको लगता है कि दिबाकर पांडेय और उन जैसे लाखों किसानों को न्याय मिलना चाहिए, तो इस मुद्दे को उठाएं। सोशल मीडिया पर शेयर करें, स्थानीय अधिकारियों को टैग करें, और पूछें: "MSP का वादा पूरा करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसानों की आवाज सुनने के लिए कोई तैयार है?"
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कमेंट में बताएं: क्या आपके क्षेत्र के पैक्स केंद्र पर भी किसानों को ऐसे झूठे वादे मिलते हैं? सच्चाई सामने लाएं!

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह ब्लॉग केवल जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें उपयोग की गई "प्रगति यात्रा" जमुई की तस्वीर माननीय मुख्यमंत्री बिहार और उनकी टीम की है, जो केवल संदर्भ हेतु उपयोग की गई है। इस तस्वीर का उपयोग किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत, राजनीतिक या व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं किया गया है, और न ही इसका उद्देश्य किसी की छवि को ठेस पहुँचाना है।

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