Monday, February 3, 2025

"मनरेगा में फर्जी हाजिरी और भ्रष्टाचार: क्या ड्रोन निगरानी प्रणाली लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई में बदलाव ला पाएगी?"


मनरेगा की पारदर्शिता और प्रभावशीलता को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। फर्जी हाजिरी, अधूरे काम, और मजदूरों को उनके हक का पैसा न मिलना, ये सब ऐसी समस्याएं हैं जो इस योजना को खोखला कर रही हैं। हाल ही में मैंने अपने ब्लॉग में उजागर किया था कि कैसे लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई में अधिकारी और मेट्स मिलकर NMMS (National Mobile Monitoring System) को ठेंगा दिखा रहे हैं। असली मजदूरों की उपस्थिति लेने की बजाय, प्रिंट की हुई तस्वीरों को अपलोड कर दिया जाता है और पूरा खेल चलता रहता है। जिला से लेकर उच्च अधिकारियों तक कोई इस पर ध्यान नहीं देता, मानो "कमल के अंदर घी पीने" की उनकी अपनी दुनिया हो, जिसमें सबकुछ सुचारू रूप से चल रहा हो। अब सरकार ने इस पूरे सिस्टम में ड्रोन निगरानी तकनीक जोड़ने का फैसला किया है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इससे कुछ बदलेगा? या फिर यह भी एक और कागजी सुधार बनकर रह जाएगा?

ड्रोन निगरानी प्रणाली को इस योजना में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए जोड़ा गया है। अब हर जिले में मनरेगा कार्यों की वास्तविक प्रगति पर नजर रखने के लिए ड्रोन कैमरे से निगरानी होगी। योजना के तहत हर कार्यस्थल की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए जाएंगे, जिससे पता चलेगा कि कार्य सही तरीके से हो रहा है या नहीं। खास बात यह है कि यह निगरानी केवल कार्यों के दौरान ही नहीं, बल्कि शुरू होने से पहले और पूरा होने के बाद भी की जाएगी। इससे उन मामलों पर भी नजर रखी जा सकेगी जहां कागजों में काम पूरा दिखा दिया जाता है, लेकिन जमीन पर कुछ भी नहीं होता।

यह पूरा सिस्टम केवल ड्रोन से वीडियो रिकॉर्ड करने तक सीमित नहीं रहेगा। हर फुटेज को जियो-टैग किया जाएगा और यह सीधे "NREGA Soft" पोर्टल पर अपलोड होगा। यह डेटा 15 दिनों तक ऑनलाइन स्टोर रहेगा, और जरूरत पड़ने पर राज्य या जिला स्तर पर इसे डाउनलोड कर सकते हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि एक केंद्रीकृत डैशबोर्ड तैयार किया जाएगा, जहां से पूरे देश के मनरेगा कार्यों की निगरानी हो सकेगी। इससे अधिकारियों के पास किसी भी परियोजना की प्रगति को देखने का वास्तविक प्रमाण होगा।

ड्रोन के जरिए विशेष निरीक्षण भी किया जाएगा। अगर किसी परियोजना को लेकर गड़बड़ी की शिकायत मिलती है, तो ड्रोन की मदद से उसका विशेष सर्वेक्षण किया जाएगा। ओम्बड्समैन को भी ड्रोन निगरानी के आधार पर मामलों की जांच करने का अधिकार दिया गया है। इससे शिकायतों का निपटारा तेजी से हो सकेगा और यह सुनिश्चित होगा कि निरीक्षण के नाम पर की जा रही हेरा-फेरी खत्म हो।

तकनीकी दृष्टि से देखें तो यह प्रणाली काफी उन्नत है। ड्रोन में 4K रिज़ॉल्यूशन कैमरा होगा, जिससे तस्वीरें और वीडियो स्पष्ट रूप से कैप्चर किए जा सकेंगे। यह केवल ऊर्ध्वाधर (Vertical) नहीं बल्कि तिरछे (Oblique) और 360 डिग्री व्यू में भी डेटा कैप्चर करेगा। इसके अलावा, ड्रोन को कम से कम 30 मिनट तक हवा में रहने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि यह विस्तृत निगरानी कर सके।

अब सवाल उठता है कि क्या यह प्रणाली लक्ष्मीपुर तालुका, जमुई जैसे क्षेत्रों में चल रहे फर्जीवाड़े को रोक पाएगी? NMMS की धांधली तो पहले से ही जारी है। जब मजदूर की फोटो लेकर उसे प्रिंट करके अपलोड करने का खेल चल सकता है, तो क्या ड्रोन का डेटा भी मैन्युपुलेट नहीं किया जा सकता? जिला से लेकर राज्य तक के अधिकारी इस पूरे खेल में शामिल हैं, तो यह कहना मुश्किल है कि वे ड्रोन फुटेज को भी एडिट करवाने से पीछे हटेंगे।

अगर वास्तव में इस प्रणाली को असरदार बनाना है, तो इसके लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि ड्रोन फुटेज को पब्लिक डोमेन में डाला जाए, ताकि कोई भी नागरिक उसे देख सके और शिकायत कर सके। केवल सरकारी डैशबोर्ड तक सीमित डेटा का कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि वही अधिकारी इसे देखेंगे, जो पहले से ही "सब ठीक है" का प्रमाण पत्र जारी करने के आदी हैं। इसके अलावा, हर महीने सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए, जिसमें ग्रामीण नागरिकों को भी शामिल किया जाए, ताकि वे अपनी राय दे सकें और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।

इसके साथ ही, भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। केवल रिपोर्ट दर्ज कर मामले को ठंडे बस्ते में डालने से कुछ नहीं होगा। मनरेगा में जिन अधिकारियों को फर्जी हाजिरी, जॉब कार्ड घोटाले और अधूरे कामों के लिए जिम्मेदार पाया जाता है, उन्हें न केवल बर्खास्त किया जाना चाहिए, बल्कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए। जब तक सख्त कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक कोई भी तकनीकी समाधान वास्तविक सुधार नहीं ला सकता।

ड्रोन निगरानी प्रणाली एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब इसे सही तरीके से लागू किया जाए। लक्ष्मीपुर तालुका में जो भ्रष्टाचार अभी जारी है, अगर वही अधिकारी इस सिस्टम को संभालेंगे, तो यह भी दिखावे की योजना बनकर रह जाएगा। इसलिए असली सवाल यही है – क्या ड्रोन से बदलाव आएगा या यह भी 'घोस्ट' रिपोर्टिंग का एक और हथियार बन जाएगा? क्या यह वाकई उन मजदूरों की जिंदगी बदल सकेगा जो हर दिन अपने परिवार का पेट भरने के लिए मनरेगा पर निर्भर हैं? या फिर यह भी सिर्फ एक और सरकारी प्रयोग साबित होगा, जिसे कुछ समय बाद भुला दिया जाएगा?

गांवों के खेतों और निर्माण स्थलों पर जब ड्रोन मंडराते दिखेंगे, तो यह देखने वाली बात होगी कि यह बदलाव की असली शुरुआत है या फिर एक और सरकारी दिखावा। भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे इस सिस्टम को निकालने के लिए सिर्फ ड्रोन काफी नहीं होंगे, इसके लिए एक ईमानदार प्रशासन और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। अब देखना यह है कि यह नई व्यवस्था ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में कितनी कारगर साबित होती है।

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह ब्लॉग केवल सूचनात्मक और विश्लेषणात्मक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। इसमें व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत अनुभव, स्थानीय रिपोर्टों और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं। इस लेख का उद्देश्य मनरेगा में पारदर्शिता और प्रशासनिक सुधारों पर चर्चा करना है, न कि किसी विशेष व्यक्ति, संस्था या सरकारी विभाग को बदनाम करना।

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