बेड पर पड़ा बुजुर्ग दर्द से कराह रहा था। पास खड़ी एक महिला की आँखों में चिंता थी, लेकिन उसके सामने खड़ा रिपोर्टर सवाल पर सवाल किए जा रहा था। इस नजारे को देखकर एक अजीब-सी बेचैनी हुई—क्या अस्पताल का आपातकालीन वार्ड अब खबरों का स्टूडियो बन चुका है? क्या मरीजों की पीड़ा अब सिर्फ टीआरपी का ज़रिया है?
दूसरी तरफ, अगर यही मीडिया वाले थोड़ा और मेहनत करते, तो इन्हें कहीं और भी बड़े मुद्दे मिल सकते थे। अस्पताल में मरीजों की हालत दिखाने से ज्यादा ज़रूरी था उन किसानों की कहानी बताना, जिन्हें उनके ही खेतों में उगाए गए धान को MSP रेट से कम पर बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है। काला पंचायत पैक्स में हो रही इस धांधली से किसान परेशान हैं, पर प्रशासन की नींद नहीं टूट रही। DM से लेकर DCO तक गुहार लगाई गई, पर जवाब सिर्फ आश्वासन का मिला।
या फिर चलिए ज़रा गाँव की गलियों में चलते हैं, जहाँ मनरेगा योजना के नाम पर फर्जी अटेंडेंस भरी जा रही है। सरकारी रिकॉर्ड्स में खूब सारा तालाब खुद रहे हैं, लेकिन असलियत में वहाँ सिर्फ सूखी ज़मीन है। अधिकारी रिपोर्ट में "सफलता" के झूठे आंकड़े जोड़ रहे हैं, और मज़दूरों की मेहनत की जगह कागजों पर हेरफेर चल रहा है।
लेकिन यह सब दिखाने के लिए मीडिया को मेहनत करनी पड़ती। सवाल उठाने होते, जोखिम लेना पड़ता, सत्ता से टकराने का साहस चाहिए होता। अस्पताल में आकर डॉक्टरों और मरीजों से सवाल करना आसान है, लेकिन गांव में जाकर सच सामने लाना मुश्किल।
मीडिया की असली ज़िम्मेदारी क्या होनी चाहिए—अस्पताल में बेड पर पड़े मरीज का इंटरव्यू लेना या खेतों में खड़े किसान की आवाज़ उठाना? कैमरे की चमक सही जगह पड़ती तो शायद किसी की तकलीफ कम हो सकती थी, लेकिन अफसोस कि खबरें अब सिर्फ आसानी से मिलने वाली ब्रेकिंग न्यूज़ तक ही सीमित रह गई हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer):
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