बिहार की पवित्र भूमि ने समय-समय पर कई संतों, योगियों और समाज सुधारकों को जन्म दिया है। इन्हीं में एक नाम है – बाबा कोकिलचंद, जिनकी गाथा आज भी जमुई जिले के गाँवों में श्रद्धा, प्रेरणा और अनुशासन का प्रतीक बनी हुई है।
बाबा कोकिलचंद की कथा: बाघ की गुफा से देवत्व तक की यात्रा
कहते हैं, करीब 700 वर्ष पूर्व, जब जमुई का इलाका घने जंगलों से ढका था, उस समय गंगरा गांव में बाबा कोकिलचंद एक साधारण ग्रामीण के रूप में रहते थे। एक दिन वे जंगल में लकड़ी काटने गए, जहाँ उनका सामना एक खूंखार बाघ से हुआ। उन्होंने अपनी आत्मरक्षा में बाघ को मार डाला। लेकिन जब उसकी बाघिन आई, तो उन्होंने उसे मारने से इनकार कर दिया।
बाबा ने कहा, "नारी पर हाथ उठाना धर्म के विरुद्ध है, चाहे वो मानव हो या पशु।" और उन्होंने बाघिन के सामने आत्म-समर्पण कर दिया। यह उनका त्याग नहीं, बल्कि एक युगांतकारी संदेश था – नारी का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है।
यह घटना जंगल की अग्नि की तरह फैली, और लोगों ने उन्हें केवल एक साधु नहीं, ‘देवपुरुष’ मान लिया। तभी से गंगरा गांव में उनकी पूजा आरंभ हुई।
कालापंचायत में बाबा कोकिलचंद की पूजा: 200 वर्षों की अदृश्य परंपरा
जमुई जिला के लक्ष्मीपुर प्रखंड स्थित कालापंचायत में बाबा कोकिलचंद की पूजा लगभग 200 वर्षों से लगातार हो रही है। हालांकि इसकी सटीक शुरुआत की तिथि इतिहास में दर्ज नहीं, लेकिन यहां के बुज़ुर्गों की मान्यता है कि यह परंपरा उनके पुरखों से भी पहले की है।
यह पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव की आत्मा है। साल में एक बार गाँव के लोग सामूहिक रूप से बाबा का ढोल-नगाड़ों, गीतों और मंत्रोच्चारण के साथ पूजन करते हैं।
क्या है इस पूजा की खासियत?
- रात भर चलता है कीर्तन और जागरण।
- बाबा की कथा गायी जाती है, जिसे गांव के बुज़ुर्ग पीढ़ियों से सुनाते आ रहे हैं।
- सभी जातियों और वर्गों के लोग एक साथ बैठकर पूजन करते हैं – सामाजिक समरसता का आदर्श रूप।
- पूजा के बाद होता है महाभोज, जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ भोजन करते हैं।
बाबा के उपदेश जो कालापंचायत के जीवन में रच-बस गए हैं:
- नारी का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है।
- शराब और नशे से जीवन को नष्ट न करो।
- अन्न को ईश्वर का प्रसाद समझो – उसका सम्मान करो।
आज भी कालापंचायत के अधिकतर घरों में शराब का नामोनिशान नहीं है, महिलाएं सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी रही हैं, और अन्न की बर्बादी पाप मानी जाती है।
एक नया युग: बाबा कोकिलचंद अब केवल एक गांव के नहीं, पूरे समाज के हैं
आज आवश्यकता है कि इस लोकदेवता की पहचान केवल गांवों तक सीमित न रहे। यह बाबा:
- सामाजिक न्याय का प्रतीक हैं,
- सांस्कृतिक चेतना के संवाहक हैं,
- और मानवता की लौ हैं, जो जंगल से उठकर समाज के कोने-कोने में रोशनी फैला रही है।
कालापंचायत, जहां 200 वर्षों से यह दीप जला हुआ है, वह खुद एक धार्मिक पर्यटन स्थल बनने की क्षमता रखता है।
निष्कर्ष:
बाबा कोकिलचंद की पूजा एक आस्था नहीं, जीवनशैली है। वह हमें सिखाते हैं कि धर्म केवल मंदिरों में नहीं होता, बल्कि व्यवहार, सम्मान और सेवा में होता है। कालापंचायत की 200 साल पुरानी यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि जब एक गांव श्रद्धा से जुड़ता है, तो वह इतिहास और भविष्य दोनों को दिशा देता है।
यह रहा ब्लॉग के लिए एक उपयुक्त Disclaimer (अस्वीकरण):
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस ब्लॉग में प्रस्तुत बाबा कोकिलचंद से संबंधित जानकारी ग्रामीण जनश्रुतियों, स्थानीय विश्वासों, और बुज़ुर्गों से प्राप्त मौखिक इतिहास पर आधारित है। पूजा की परंपरा, वर्षों की गणना और ऐतिहासिक घटनाओं की सटीकता का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह लेख केवल सामुदायिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के संरक्षण के उद्देश्य से लिखा गया है।
लेखक का उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। यदि किसी तथ्य से कोई आपत्ति हो तो कृपया संवाद करें; आवश्यकतानुसार सुधार किया जा सकता है।
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