लक्ष्मीपुर (जमुई, बिहार), 23 मई 2025 | प्रमोद पांडेय, व्यक्तिगत ब्लॉग लेखक
यह ब्लॉग मेरे निजी अध्ययन और आनंदपुर पंचायत की सोशल ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित है। मैं कोई पत्रकार नहीं, बस एक जागरूक नागरिक, जो ग्रामीण भारत की सच्चाई को सामने लाने की कोशिश कर रहा है!
मैं कोई समाचार रिपोर्टर नहीं, बस एक ब्लॉगर हूँ — प्रमोद पांडेय।
“पारदर्शिता का ढोल और भ्रष्टाचार का खेल! आनंदपुर पंचायत में ₹1.18 करोड़ की हेराफेरी ने मनरेगा के वादों को कठघरे में ला खड़ा किया!”
मनरेगा घोटालों की एक और कड़ी
बिहार के जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड की आनंदपुर पंचायत में 12 मार्च 2025 को हुई सोशल ऑडिट ग्राम सभा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का पैसा गाँवों तक पहुँचने से पहले ही कागजों पर लुट रहा है। ₹1.18 करोड़ की वित्तीय अनियमितता का यह खुलासा कोई इकलौता मामला नहीं, बल्कि एक ऐसी शृंखला का हिस्सा है, जो ग्रामीण भारत के विकास के सपनों को चकनाचूर कर रही है।
मैंने इस सोशल ऑडिट रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया और जो देखा, उसने मुझे झकझोर कर रख दिया। यह ब्लॉग मेरी निजी कोशिश है कि इस सिलसिलेवार लूट को उजागर किया जाए और ग्रामीणों की आवाज को बुलंद किया जाए।
आंकड़ों का जाल: ₹1.18 करोड़ का घपला
सोशल ऑडिट और क्रियान्वयन एजेंसी के आंकड़ों में जो अंतर सामने आया, वह किसी डकैती से कम नहीं। आइए, इस काले सच को बेपर्दा करते हैं:
★ मजदूरी व्यय: सोशल ऑडिट के अनुसार ₹97,36,945 का खर्च, लेकिन एजेंसी ने सिर्फ ₹9,73,645 दिखाया।
★ ₹87,63,300 का गायब पैसा!
★ सामग्री व्यय: ऑडिट में ₹34,40,429.06 का हिसाब, जबकि एजेंसी ने केवल ₹3,44,029.06 दर्ज किया।
★ ₹30,96,400 की हेराफेरी!
★ कुल नुकसान: सोशल ऑडिट के मुताबिक कुल खर्च ₹1,31,77,374.06, लेकिन एजेंसी ने सिर्फ ₹13,17,674.06 का दावा किया।
यानी
★ ₹1.18 करोड़ का संभावित घोटाला!
इन आंकड़ों को देखकर मन में सवाल उठता है: यह पैसा आखिर किसकी जेब में गया? क्या यह उन मेहनतकश मजदूरों का हक था, जो गाँव की टूटी सड़कों और सूखे खेतों में पसीना बहाते हैं?
कार्रवाई की चुप्पी: सिस्टम की नाकामी
सबसे दुखद बात यह है कि इन पांच वित्तीय विचलनों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
★ न वसूली, न FIR, न निलंबन, न जुर्माना! यह तो ऐसा है जैसे सिस्टम ने ग्रामीणों के साथ मजाक कर लिया हो। मैंने जब यह रिपोर्ट पढ़ी, तो सोचने पर मजबूर हो गया कि अगर इतने बड़े घोटाले पर कोई जवाबदेही नहीं, तो मनरेगा का मकसद क्या रह गया?
स्थानीय निवासी रामू पासवान (काल्पनिक नाम) की बात मेरे मन को छू गई: “हम दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन हमारा पैसा कोई और ले जा रहा है। यह तो सरासर धोखा है!” ग्राम सभा में भी ग्रामीणों ने जमकर नारेबाजी की, लेकिन प्रशासन की ओर से सिर्फ खोखले वादे ही मिले।
ग्रामीणों की पुकार, मेरी आवाज
मैं कोई बड़ा पत्रकार नहीं, न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता। बस एक आम इंसान हूँ, जो इस सच्चाई को सामने लाना चाहता है। आनंदपुर के उन ग्रामीणों की आवाज मेरे मन में गूंज रही है, जो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं।
मैंने सोचा, अगर मैं वहाँ होता, तो शायद एक बुजुर्ग ग्रामीण मुझसे कहता,
★ “बेटा, हम तो बस अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी चाहते हैं। लेकिन हमारा पैसा कोई और खा रहा है!”
यह ब्लॉग मेरी कोशिश है कि इस सिलसिलेवार लूट को उजागर किया जाए। आनंदपुर का यह घोटाला सिर्फ एक पंचायत की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश में चल रही उस व्यवस्था का हिस्सा है, जो ग्रामीणों के सपनों को कुचल रही है।
अस्वीकरण (Disclaimer)..
यह लेख केवल सूचना हेतु प्रस्तुत किया गया है। इसमें दी गई सभी जानकारियाँ मैंने मनरेगा (NREGA) की आधिकारिक वेबसाइटों से संकलित की हैं। कृपया किसी भी निर्णय से पूर्व संबंधित आधिकारिक पोर्टल पर जाकर जानकारी की पुष्टि अवश्य करें। यहां प्रस्तुत आंकड़ों या तथ्यों में त्रुटि की संभावना हो सकती है, जिसके लिए मैं उत्तरदायी नहीं हूँ।
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