Saturday, May 31, 2025

लक्ष्मीपुर खेलार (खिलाड़) (जमुई, बिहार) में मनरेगा का बड़ा घोटाला!


📌 खिलर पंचायत, जमुई, बिहार में MGNREGA सामाजिक अंकेक्षण 2023-24 की वित्तीय अनियमितताओं का विश्लेषण

विशेष खबर:
जमुई जिले के लक्ष्मीपुर ब्लॉक की खेलार (खिलाड़) पंचायत में मनरेगा (MGNREGA) के तहत हुए कामकाज का हिसाब-किताब गायब है।


2023-24 की सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया:

पंचायत ने ₹0 खर्च बताया, जबकि ऑडिट में ₹1,02,73,582.08 खर्च दर्ज हुआ।

यह 100% विसंगति घोटाले की बड़ी आशंका पैदा करती है।


⚠️ खेलार (खिलाड़) पंचायत का चौंकाने वाला सच:

  • 💰 कुल खर्च: ₹1,02,73,582.08
    • मजदूरी: ₹73,05,698
    • सामग्री: ₹29,67,884.08
  • 🧾 पंचायत ने दावा किया: ₹0 खर्च
  • 📂 FTOs (पैसे भेजने का रिकॉर्ड): उपलब्ध नहीं
  • 🚫 10 बड़ी गड़बड़ियाँ, सभी अब तक लंबित

प्रमुख अनियमितताएँ:

🔴 वित्तीय विचलन:

  • ₹1.03 करोड़ खर्च का कोई रिकॉर्ड नहीं

🔴 प्रक्रियागत उल्लंघन:

  • काम की मांग दर्ज करने का मौका नहीं मिला
  • वॉल राइटिंग/सूचना बोर्ड नदारद
  • सामाजिक अंकेक्षण नियमित नहीं
  • 15 मजदूरों के पास जॉब कार्ड नहीं
  • पे-स्लिप्स नहीं मिलीं
  • शिकायत रजिस्टर, संपत्ति रजिस्टर गायब
  • मनरेगा जागरूकता बेहद कम

🔴 शिकायतें:

  • मजदूरी पर्चियों की अनुपलब्धता
  • ग्राम सभा की जानकारी बहुत कम

🧾 ऑडिट रिपोर्ट: कितनी पारदर्शिता, कितनी लापरवाही?

  • 📅 ऑडिट अवधि: 17-21 मार्च 2025
  • 👥 ग्राम सभा: 22 मार्च 2025 – मात्र 62 मजदूरों की भागीदारी (900 परिवारों में से)
  • 💸 ऑडिट पर खर्च दिखाया गया: ₹0
  • 🔍 सत्यापन:
    • कार्य: 11/172 (6.4%)
    • परिवार: 447/900 (49.7%)
    • इतने कम सैंपल में ही ₹1.03 करोड़ की गड़बड़ी उजागर!

👷‍♂️ मजदूरों की हालत:

  • काम माँगने पर भी नहीं मिला
  • जॉब कार्ड तो हैं, लेकिन अपडेट नहीं
  • 7 जरूरी रजिस्टर पंचायत में नहीं मिले
  • शिकायत की कोई प्रक्रिया नहीं
  • ग्राम सभा में मजदूरों की बात नहीं सुनी गई

🟢 कुछ सकारात्मक पहलू:

  • कार्यस्थल पर पीने का पानी, छाया और प्राथमिक इलाज
  • सूचना बोर्ड लगे थे
  • मनरेगा स्टाफ और तकनीकी सहायक तैनात

❗ लेकिन ये छोटी बातें ₹1.03 करोड़ की गड़बड़ी के सामने बहुत छोटी हैं।


सवाल जो उठते हैं:

  • ₹1.03 करोड़ कहाँ गया?
  • जिम्मेदारी कौन लेगा?
  • क्या ये जानबूझकर किया गया घोटाला है?
  • FTO छुपाना किसकी जिम्मेदारी है?

📢 सरकार से माँग – जनता से अपील:

🔴 जमुई जिला प्रशासन से माँग:

  1. फोरेंसिक ऑडिट किया जाए
  2. FTOs सार्वजनिक किए जाएँ
  3. दोषियों पर FIR व निलंबन हो
  4. मजदूरों को पेस्लिप्स, काम और जॉब कार्ड मिले
  5. ग्राम सभा में भागीदारी बढ़ाने के लिए अभियान चलाया जाए

🟢 हमारी अपील – जनता से:

ग्राम सभा में शामिल हों
दीवार लेखन और सूचना बोर्ड देखें
पंचायत से सवाल पूछें
यह पैसा आपका है – हक भी आपका है


📌 निष्कर्ष: एक पंचायत की कहानी, पूरे राज्य की चेतावनी

खिलर पंचायत में ₹1.03 करोड़ का घोटाला सिर्फ एक उदाहरण नहीं,
यह पूरे सिस्टम की असफलता का प्रतीक है।
अगर आज हम चुप रहे, तो कल हर गाँव का यही हाल होगा।


अस्वीकरण (Disclaimer)..
यह लेख केवल सूचना हेतु प्रस्तुत किया गया है। इसमें दी गई सभी जानकारियाँ मैंने मनरेगा (NREGA) की आधिकारिक वेबसाइटों से संकलित की हैं। कृपया किसी भी निर्णय से पूर्व संबंधित आधिकारिक पोर्टल पर जाकर जानकारी की पुष्टि अवश्य करें। यहां प्रस्तुत आंकड़ों या तथ्यों में त्रुटि की संभावना हो सकती है, जिसके लिए मैं उत्तरदायी नहीं हूँ।

Wednesday, May 28, 2025

काला पंचायत में 15वें वित्त आयोग फंड के उपयोग पर सवाल: सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट ने खोली सच्चाई


📍 स्थान: काला पंचायत, लक्ष्मीपुर ब्लॉक, जमुई जिला (बिहार)

📅 ऑडिट अवधि: वित्तीय वर्ष 2022–2023
🗂 स्रोत: भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय के निर्देश पर किया गया सामाजिक अंकेक्षण


🧾 काला पंचायत की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आए मुख्य तथ्य

काला पंचायत की रिपोर्ट में कुल 9 प्रमुख टिप्पणियाँ/गड़बड़ियाँ दर्ज की गई हैं, जो पंचायत की कार्यप्रणाली, वित्तीय ईमानदारी और पारदर्शिता पर सवाल उठाती हैं।

🔍 नीचे उन सभी बिंदुओं की विस्तृत जानकारी दी गई है:


1️⃣ रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया (3 मामले)

👉 सामाजिक अंकेक्षण के लिए आवश्यक दस्तावेज जैसे वाउचर, भुगतान रजिस्टर, रजिस्टर ऑफ वर्क्स आदि पंचायत द्वारा प्रस्तुत नहीं किए गए।
⚠️ महत्व: बिना रिकॉर्ड ऑडिट नहीं किया जा सकता। यह पारदर्शिता की सीधी अनदेखी है।
📌 परिणाम: खर्च की वैधता की जाँच नहीं हो सकी।


2️⃣ अग्रिम राशि का समायोजन नहीं (1 मामला)

👉 पंचायत द्वारा किसी कार्य के लिए ली गई एडवांस राशि का पूरा हिसाब प्रस्तुत नहीं किया गया।
📌 परिणाम: यह दर्शाता है कि योजना में लिये गए फंड का प्रयोग कितना अस्थिर या संदिग्ध रहा।


3️⃣ कटौती की गई राशि जमा नहीं की गई (1 मामला)

👉 कर्मचारियों या ठेकेदारों से TDS, PF आदि के रूप में की गई कटौती सरकार को जमा नहीं की गई।
⚠️ महत्व: यह कानूनन गलत है और सीधे तौर पर आर्थिक लापरवाही का प्रमाण है।


4️⃣ अनुदान का उपयोग समय पर नहीं हुआ (1 मामला)

👉 जो राशि Kala पंचायत को विकास कार्यों के लिए दी गई थी, वह समयसीमा के भीतर खर्च नहीं की गई।
📌 परिणाम: पंचायत को अगले चरण में मिलने वाला फंड प्रभावित हो सकता है। इससे गाँव का विकास भी रुकेगा।


5️⃣ योजना के फिजिकल और फाइनेंशियल आंकड़ों में अंतर (1 मामला)

👉 जिन कार्यों पर पैसा खर्च बताया गया, उनकी जमीन पर प्रगति नहीं दिखी।
⚠️ महत्व: यह सीधा इशारा करता है कि रिपोर्ट में गड़बड़ी हो सकती है – या तो काम नहीं हुआ, या रिपोर्ट में बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया।


6️⃣ रिपोर्ट में प्रमुख आपत्तियों और रिकवरी का सारांश (1 मामला)

👉 अंकेक्षण रिपोर्ट में पाई गई आपत्तियों की सूची तैयार की गई है, लेकिन उसके अनुसार कोई कार्रवाई नहीं की गई।


7️⃣ प्रशासनिक जानकारी संकलित (1 मामला)

👉 केवल पंचायत और ऑडिट टीम से जुड़ी सामान्य जानकारी दी गई है – इससे कोई सुधारात्मक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका।


🧭 समग्र निष्कर्ष: क्या काला पंचायत में घोर लापरवाही हुई है?

  • रिकॉर्ड न देना यह दर्शाता है कि पंचायत जानबूझकर ऑडिट से बचना चाहती है।
  • समय पर अनुदान का उपयोग नहीं होना यह दिखाता है कि कार्य योजना कमजोर है।
  • वास्तविक प्रगति और रिपोर्ट में अंतर यह संकेत देता है कि या तो काम फर्जी है, या दस्तावेज़ों में गड़बड़ी की गई है।
  • एक भी गड़बड़ी का समाधान नहीं किया गया है, जो यह दर्शाता है कि पंचायत प्रशासन रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं ले रहा।

🧮 CAG और पंचायती राज मंत्रालय की सिफारिशें क्या कहती हैं?

भारत के महालेखा परीक्षक (CAG) और पंचायती राज मंत्रालय दोनों ने पंचायतों को चेतावनी दी है कि:

“अगर पंचायतें रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं करतीं और पारदर्शिता नहीं दिखातीं, तो उनका फंड रोका जा सकता है।”

काला पंचायत की स्थिति इसी चेतावनी की पुष्टि करती है।


आगे क्या होना चाहिए? (सुझाव)

  1. काला पंचायत की रिपोर्ट को ग्राम सभा में सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाए
  2. जिन रिकॉर्ड्स को प्रस्तुत नहीं किया गया, उन्हें जल्द से जल्द सार्वजनिक किया जाए
  3. पंचायत के द्वारा लिए गए फंड्स की स्वतंत्र जांच हो
  4. सभी दोषियों की जवाबदेही तय की जाए
  5. ग्राम वासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए

🙋‍♂️ आपका अधिकार, आपकी भागीदारी

सामाजिक अंकेक्षण कोई सरकारी औपचारिकता नहीं है, यह जनता का अधिकार है
गाँव का पैसा गाँव के विकास में ही लगे, यह सुनिश्चित करना हम सभी की ज़िम्मेदारी है।


✍️ निष्कर्ष

काला पंचायत में 15वें वित्त आयोग से प्राप्त अनुदान का उपयोग पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ नहीं किया गया।
इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेकर तत्काल कार्रवाई आवश्यक है, ताकि आने वाले वर्षों में पंचायतें अपनी जवाबदेही को समझें।


#KalaPanchayat #सामाजिक_अंकेक्षण #15वां_वित्त_आयोग #पंचायत_जवाबदेही #AuditReport #Jamui #Laxmipur #गाँव_का_हक

(यह लेख भारत सरकार के सामाजिक अंकेक्षण रिपोर्ट और वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया है।)

🔒 अस्वीकरण (Disclaimer):

इस लेख/ब्लॉग में प्रस्तुत सभी आंकड़े, रिपोर्ट और जानकारियाँ भारत सरकार के संबंधित विभागों एवं पोर्टलों (जैसे पंचायती राज मंत्रालय, सामाजिक अंकेक्षण पोर्टल आदि) से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से ली गई हैं।

मैं, एक स्वतंत्र ब्लॉगर के रूप में, इन आंकड़ों की सत्यता या आधिकारिक स्थिति के लिए उत्तरदायी नहीं हूँ।

इसका उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना और ग्रामीण विकास पर चर्चा को प्रोत्साहित करना है।

कृपया किसी भी आधिकारिक कार्रवाई या निष्कर्ष के लिए संबंधित सरकारी विभाग से पुष्टि करें।




Monday, May 26, 2025

🚨 मनरेगा में लूट का सिलसिला: आनंदपुर पंचायत में ₹1.18 करोड़ का घोटाला उजागर! 🚨


लक्ष्मीपुर (जमुई, बिहार), 23 मई 2025 | प्रमोद पांडेय, व्यक्तिगत ब्लॉग लेखक

यह ब्लॉग मेरे निजी अध्ययन और आनंदपुर पंचायत की सोशल ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित है। मैं कोई पत्रकार नहीं, बस एक जागरूक नागरिक, जो ग्रामीण भारत की सच्चाई को सामने लाने की कोशिश कर रहा है!
मैं कोई समाचार रिपोर्टर नहीं, बस एक ब्लॉगर हूँ — प्रमोद पांडेय।
पारदर्शिता का ढोल और भ्रष्टाचार का खेल! आनंदपुर पंचायत में ₹1.18 करोड़ की हेराफेरी ने मनरेगा के वादों को कठघरे में ला खड़ा किया!”

मनरेगा घोटालों की एक और कड़ी

बिहार के जमुई जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड की आनंदपुर पंचायत में 12 मार्च 2025 को हुई सोशल ऑडिट ग्राम सभा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का पैसा गाँवों तक पहुँचने से पहले ही कागजों पर लुट रहा है। ₹1.18 करोड़ की वित्तीय अनियमितता का यह खुलासा कोई इकलौता मामला नहीं, बल्कि एक ऐसी शृंखला का हिस्सा है, जो ग्रामीण भारत के विकास के सपनों को चकनाचूर कर रही है।

मैंने इस सोशल ऑडिट रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन किया और जो देखा, उसने मुझे झकझोर कर रख दिया। यह ब्लॉग मेरी निजी कोशिश है कि इस सिलसिलेवार लूट को उजागर किया जाए और ग्रामीणों की आवाज को बुलंद किया जाए।

आंकड़ों का जाल: ₹1.18 करोड़ का घपला

सोशल ऑडिट और क्रियान्वयन एजेंसी के आंकड़ों में जो अंतर सामने आया, वह किसी डकैती से कम नहीं। आइए, इस काले सच को बेपर्दा करते हैं:

मजदूरी व्यय: सोशल ऑडिट के अनुसार ₹97,36,945 का खर्च, लेकिन एजेंसी ने सिर्फ ₹9,73,645 दिखाया। 
★ ₹87,63,300 का गायब पैसा!

सामग्री व्यय: ऑडिट में ₹34,40,429.06 का हिसाब, जबकि एजेंसी ने केवल ₹3,44,029.06 दर्ज किया। 
★ ₹30,96,400 की हेराफेरी!

कुल नुकसान: सोशल ऑडिट के मुताबिक कुल खर्च ₹1,31,77,374.06, लेकिन एजेंसी ने सिर्फ ₹13,17,674.06 का दावा किया।
 यानी 
₹1.18 करोड़ का संभावित घोटाला!

इन आंकड़ों को देखकर मन में सवाल उठता है: यह पैसा आखिर किसकी जेब में गया? क्या यह उन मेहनतकश मजदूरों का हक था, जो गाँव की टूटी सड़कों और सूखे खेतों में पसीना बहाते हैं?

कार्रवाई की चुप्पी: सिस्टम की नाकामी

सबसे दुखद बात यह है कि इन पांच वित्तीय विचलनों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
 ★ न वसूली, न FIR, न निलंबन, न जुर्माना! यह तो ऐसा है जैसे सिस्टम ने ग्रामीणों के साथ मजाक कर लिया हो। मैंने जब यह रिपोर्ट पढ़ी, तो सोचने पर मजबूर हो गया कि अगर इतने बड़े घोटाले पर कोई जवाबदेही नहीं, तो मनरेगा का मकसद क्या रह गया?

स्थानीय निवासी रामू पासवान (काल्पनिक नाम) की बात मेरे मन को छू गई: “हम दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन हमारा पैसा कोई और ले जा रहा है। यह तो सरासर धोखा है!” ग्राम सभा में भी ग्रामीणों ने जमकर नारेबाजी की, लेकिन प्रशासन की ओर से सिर्फ खोखले वादे ही मिले।

ग्रामीणों की पुकार, मेरी आवाज
मैं कोई बड़ा पत्रकार नहीं, न ही कोई सामाजिक कार्यकर्ता। बस एक आम इंसान हूँ, जो इस सच्चाई को सामने लाना चाहता है। आनंदपुर के उन ग्रामीणों की आवाज मेरे मन में गूंज रही है, जो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। 
मैंने सोचा, अगर मैं वहाँ होता, तो शायद एक बुजुर्ग ग्रामीण मुझसे कहता, 
★ “बेटा, हम तो बस अपने बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी चाहते हैं। लेकिन हमारा पैसा कोई और खा रहा है!”

यह ब्लॉग मेरी कोशिश है कि इस सिलसिलेवार लूट को उजागर किया जाए। आनंदपुर का यह घोटाला सिर्फ एक पंचायत की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश में चल रही उस व्यवस्था का हिस्सा है, जो ग्रामीणों के सपनों को कुचल रही है।

अस्वीकरण (Disclaimer)..
यह लेख केवल सूचना हेतु प्रस्तुत किया गया है। इसमें दी गई सभी जानकारियाँ मैंने मनरेगा (NREGA) की आधिकारिक वेबसाइटों से संकलित की हैं। कृपया किसी भी निर्णय से पूर्व संबंधित आधिकारिक पोर्टल पर जाकर जानकारी की पुष्टि अवश्य करें। यहां प्रस्तुत आंकड़ों या तथ्यों में त्रुटि की संभावना हो सकती है, जिसके लिए मैं उत्तरदायी नहीं हूँ।



Sunday, May 25, 2025

बाबा कोकिलचंद: जंगल से जन-जन तक पहुँची आस्था की वह लौ, जो 200 वर्षों से कालापंचायत में जल रही है


बिहार की पवित्र भूमि ने समय-समय पर कई संतों, योगियों और समाज सुधारकों को जन्म दिया है। इन्हीं में एक नाम है – बाबा कोकिलचंद, जिनकी गाथा आज भी जमुई जिले के गाँवों में श्रद्धा, प्रेरणा और अनुशासन का प्रतीक बनी हुई है।

बाबा कोकिलचंद की कथा: बाघ की गुफा से देवत्व तक की यात्रा

कहते हैं, करीब 700 वर्ष पूर्व, जब जमुई का इलाका घने जंगलों से ढका था, उस समय गंगरा गांव में बाबा कोकिलचंद एक साधारण ग्रामीण के रूप में रहते थे। एक दिन वे जंगल में लकड़ी काटने गए, जहाँ उनका सामना एक खूंखार बाघ से हुआ। उन्होंने अपनी आत्मरक्षा में बाघ को मार डाला। लेकिन जब उसकी बाघिन आई, तो उन्होंने उसे मारने से इनकार कर दिया।

बाबा ने कहा, "नारी पर हाथ उठाना धर्म के विरुद्ध है, चाहे वो मानव हो या पशु।" और उन्होंने बाघिन के सामने आत्म-समर्पण कर दिया। यह उनका त्याग नहीं, बल्कि एक युगांतकारी संदेश था – नारी का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है।

यह घटना जंगल की अग्नि की तरह फैली, और लोगों ने उन्हें केवल एक साधु नहीं, ‘देवपुरुष’ मान लिया। तभी से गंगरा गांव में उनकी पूजा आरंभ हुई।


कालापंचायत में बाबा कोकिलचंद की पूजा: 200 वर्षों की अदृश्य परंपरा

जमुई जिला के लक्ष्मीपुर प्रखंड स्थित कालापंचायत में बाबा कोकिलचंद की पूजा लगभग 200 वर्षों से लगातार हो रही है। हालांकि इसकी सटीक शुरुआत की तिथि इतिहास में दर्ज नहीं, लेकिन यहां के बुज़ुर्गों की मान्यता है कि यह परंपरा उनके पुरखों से भी पहले की है।

यह पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव की आत्मा है। साल में एक बार गाँव के लोग सामूहिक रूप से बाबा का ढोल-नगाड़ों, गीतों और मंत्रोच्चारण के साथ पूजन करते हैं।


क्या है इस पूजा की खासियत?

  • रात भर चलता है कीर्तन और जागरण।
  • बाबा की कथा गायी जाती है, जिसे गांव के बुज़ुर्ग पीढ़ियों से सुनाते आ रहे हैं।
  • सभी जातियों और वर्गों के लोग एक साथ बैठकर पूजन करते हैं – सामाजिक समरसता का आदर्श रूप।
  • पूजा के बाद होता है महाभोज, जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ भोजन करते हैं।

बाबा के उपदेश जो कालापंचायत के जीवन में रच-बस गए हैं:

  1. नारी का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है।
  2. शराब और नशे से जीवन को नष्ट न करो।
  3. अन्न को ईश्वर का प्रसाद समझो – उसका सम्मान करो।

आज भी कालापंचायत के अधिकतर घरों में शराब का नामोनिशान नहीं है, महिलाएं सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जी रही हैं, और अन्न की बर्बादी पाप मानी जाती है।


एक नया युग: बाबा कोकिलचंद अब केवल एक गांव के नहीं, पूरे समाज के हैं

आज आवश्यकता है कि इस लोकदेवता की पहचान केवल गांवों तक सीमित न रहे। यह बाबा:

  • सामाजिक न्याय का प्रतीक हैं,
  • सांस्कृतिक चेतना के संवाहक हैं,
  • और मानवता की लौ हैं, जो जंगल से उठकर समाज के कोने-कोने में रोशनी फैला रही है।

कालापंचायत, जहां 200 वर्षों से यह दीप जला हुआ है, वह खुद एक धार्मिक पर्यटन स्थल बनने की क्षमता रखता है।


निष्कर्ष:

बाबा कोकिलचंद की पूजा एक आस्था नहीं, जीवनशैली है। वह हमें सिखाते हैं कि धर्म केवल मंदिरों में नहीं होता, बल्कि व्यवहार, सम्मान और सेवा में होता है। कालापंचायत की 200 साल पुरानी यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि जब एक गांव श्रद्धा से जुड़ता है, तो वह इतिहास और भविष्य दोनों को दिशा देता है।


यह रहा ब्लॉग के लिए एक उपयुक्त Disclaimer (अस्वीकरण):


अस्वीकरण (Disclaimer):

इस ब्लॉग में प्रस्तुत बाबा कोकिलचंद से संबंधित जानकारी ग्रामीण जनश्रुतियों, स्थानीय विश्वासों, और बुज़ुर्गों से प्राप्त मौखिक इतिहास पर आधारित है। पूजा की परंपरा, वर्षों की गणना और ऐतिहासिक घटनाओं की सटीकता का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह लेख केवल सामुदायिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और परंपरा के संरक्षण के उद्देश्य से लिखा गया है।

लेखक का उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। यदि किसी तथ्य से कोई आपत्ति हो तो कृपया संवाद करें; आवश्यकतानुसार सुधार किया जा सकता है।